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    लेह से 75 किमी दूर। 17600फीट की ऊंचाई पर है चांगला स्थित दुनिया का सबसे ऊंचा रिसर्च सेंटर। दिन के साढ़े 11 बजे होंगे जब हम डीआरडीओ के इस रिसर्च सेंटर तक पहुंचे। यह पहली बार था कि मीडिया यहां पहुंचा। जीप से जैसे ही बाहर निकले, मानो करंट लगा। हडि्डयां जम गईं। रिसर्च सेंटर से बाहर आए वैज्ञानिक सरफराज ने हमें तुरंत अंदर आने को कहा। कहा-कुछ मिनट भी बाहर रुके तो फ्रास्टबाइट हो जाएगा। पहुंचे ही थे कि सिरदर्द होने लगा, शुरुआत में हमने इसे इग्नोर किया। अंदर पहुंचे तो देखा किस तरह दुर्गम परिस्थितियों में 15 वैज्ञानिक सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्र सियाचिन में तैनात जवानों के लिए ताजा सब्जियां उगाने में जुटे हैं। सरफराज ने बताया- यहां दिन में ही पारा माइनस 30 डिग्री तक होता है। रात में तो यह माइनस 40 डिग्री तक गिर जाता है। रिसर्च सेंटर के कई किमी के दायरे में जीव है जीवन। रिसर्च सेंटर में पालक, मूली जैसे पौधों की 40 तरह की प्रजातियों के पांच हजार सैंपल रखे हैं। सरफराज ने बताया-यह सुपरफूड है। यानी मात्रा में भले ही कम खाया जाए, लेकिन यह आपको कई गुना पोषक तत्व देता है। वैज्ञानिकों को कई हफ्ते तक खुले में काम करना होता है। तभी ठीक से पता चल पाता है कि जवानों की जरूरत क्या है, और उनके लिए सबसे बेहतर आहार क्या हो सकता है।   हम ऊंचाई से रिसर्च सेंटर की तस्वीर लेना चाहते थे, लेकिन लाइफ साइंसेज के डायरेक्टर जनरल डॉ. शशि बाला सिंह ने रोक दिया। हमने थोड़ी जिद की तो उन्होंने कहा-जल्द ही अंदर जाना। जल्द ही हमें फिर सिर दर्द होने लगा। ऑफिशियेटिंग डायरेक्टर ओपी चौरसिया ने हमें तुरंत लेह लौटने को कह दिया। जब हम पहली बार लेह पहुंचे थे तभी वैज्ञानिकों ने कह दिया था- डोंट बी गामा, इन लैंड ऑफ लामा। यानी लेह में आप जरूरत से ज्यादा तत्परता नहीं दिखा सकते। यहां पहला नियम आराम करने का होता है। कम से कम तीन दिन का आराम, ताकि आप माहौल में अभ्यस्त हो जाएं। हम दो दिन के आराम के बाद ही रिसर्च सेंटर की ओर निकल पड़े थे। अगले दिन हम दोबारा रिसर्च सेंटर गए। डॉ. शशि बाला सिंह ने कहा-कल सिर दर्द को और इग्नोर करते तो जान खतरे में पड़ सकती थी। यहां ऑक्सीजन का लेवल सिर्फ 60% रहता है।   अगले दिन हम चार घंटे यहां रहे। रिसर्च सेंटर को देखा। बताया गया- बर्फीले इलाकों में तैनात जवानों में डिब्बाबंद खाने से बीपी और शुगर की समस्या बढ़ रही है। इसीलिए चांगला में मेथी, पालक जैसी हरी सब्जियों की नई किस्में तैयार की जा रही हैं। यहां उगाई गई मूली के 10 ग्राम पत्ते खाने से आधा किलो सामान्य मूली के बराबर न्यूूट्रीशन मिलता है। एक बार तोड़ने के बाद ये पत्ते फिर से 10 से 12 दिन में उग आते हैं। दिलचस्प यह है कि ये सब्जियां गोलीबारी में जख्म लगने पर उन्हें जल्द ठीक भी कर देती हैं। ट्रायल में 83% तक सटीक परिणाम मिले हैं। शशि बाला सिंह बताते हैं- जल्द ही इसकी सप्लाई शुरू हो जाएगी। इन्हें फौजी एक्स्ट्रीम क्लाइमेट में बिना ज्यादा देख-रेख के उगा सकते हैं। वैज्ञानिक सरफराज ने बताया-हम यहां 15 वैज्ञानिक ही हजारों सैनिकों के लिए खाना बनाते हैं। ऑफीशिएटिंग डायरेक्टर साइंटिस्ट डॉ. ओपी चौरसिया बताते हैं- यहां इतनी ठंड है कि शरीर में असहनीय दर्द होता है। सबसे बड़ी चुनौती ऑक्सीजन की होती है। हमें दर्द कम करने के लिए पेन किलर्स लेनी पड़ती है। सेंटर से बाहर हर कदम पर सांस फूल जाती है। प्यास बुझाने के लिए बर्फ को पिघलाकर पीना पड़ता है। >शेष पेज10 पर     माइनस30 डिग्री में भी स्पेशल ग्लव्स उतारकर ही काम करना होता है। ऐसे में सिर्फ नॉर्मल ग्लव्स में हाथ जम से जाते हैं। हर रोज ये वैज्ञानिक सुबह दस बजे लेह स्थित बेस कैंप से यहां आते हैं। शाम चार बजे तक इन्हें लौटना होता है। जैसे-जैसे अंधेरा घिरता जाता है सर्दी और जानलेवा हो जाती है। लौटते वक्त डॉ. ओपी चौरसिया ने कहा- यहां बार-बार मत आना, नहीं तो मेमोरी लॉस हो जाएगा। बर्फ में रहने का यही खतरा है।  चेहरा गल रहा था, आस छूट गई थी, पर डॉक्टर्स दोगुनी ताकत से जुट गए  दुखी चेहरों के बीच करना होता है अपना सारा काम  ईश्वर से मुलाकात  सबसे बदनाम महकमे से पॉजिटिव रिपोर्ट: जोे सिर्फ हमारे लिए...  आपके सप्ताह को सकारात्मक शुरुआत देने के दो वर्ष पूरे  नो-निगेटिव दूसरीवर्षगांठ विशेष   }अभिव्यक्ति पेज पर