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दो बरस से दो प्रदेशों की पुलिस तलाश रही 1 पुलिस अफसर को   भोपाल <img src=images/p3.png<img src=images/p1.png> डीबी स्टार   निजी स्कूल संचालक अपने स्वार्थ की खातिर कोर्स के अतिरिक्त कुछ अन्य किताबें खरीदने के लिए छात्रों को बाध्य कर रहे हैं। इसका खामियाजा इन बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। सिलेबस से अधिक िकताबों के कारण इनके बस्ते का वजन बढ़ गया है। केन्द्र सरकार ने स्कूली बस्ते के वजन को लेकर गाइडलाइन भी जारी की है। साथ 2006 में शिक्षा का अधिकार एक्ट भी लागू किया गया। फिर भी स्कूल संचालकों रवैया मनमर्जी का बना हुआ है। कई दफा बस्ते का वजन बच्चों के भार से अधिक होता है। डॉक्टर्स का कहना है कि इसका दुष्प्रभाव उनके शारीरिक व मानसिक विकास पर पड़ता है। उनके कंधे और रीढ़ की हड्‌डी कमजोर हो जाती है। कुछ ऐसा ही वाकया पिछले दिनों सूरत में देखने को मिला, जहां बस्ते के बोझ के चलते एक छात्र का हाथ फ्रैक्चर हो गया। कमोबेश यही स्थिति राजधानी के निजी स्कूलों में पढ़ रहे छात्रों की है। एक अभिभावक ने नाम न छापने के अनुरोध पर बताया कि उनका 8 वर्ष का बेटा सेंट जेवियर में कक्षा दूसरी का छात्र है। उनके बेटे का वजन 14 किलो और बस्ते का लगभग 12 किलो है। इसी प्रकार एक अन्य छात्रा जो कक्षा तीसरी में पढ़ती है, उसका और बस्ते का वजन लगभग समान है।   यह है नियम   चिल्ड्रन्स स्कूल बैग एक्ट 2006 के अनुसार स्कूल बैग का वजन छात्र के वजन का 10 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए। इस नियम में नर्सरी और किंडर गार्टन में पढ़ने वाले बच्चों के लिए बस्ते ले जानी की मनाही है। स्कूल प्रबंधन को दराज और लॉकर की सुविधा बच्चों को देना चाहिए। <img src=images/p1.png>शेष पेज 2 पर  आलोक की उलझन   आला अफसर से ठगी   कैसे परवान चढ़ी हरभजन और गीता की लवलाइफ?  ऑटो रिक्शा-रेडियो ऑटो के किराये में भारी अंतर   शाम सेे अंधेरे में डूब जाता है आयुष परिसर   GST से मंशा पूर्ण   बच्चे ने खोली पोल
 
 
 
 
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