Change Your City
 

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C M Y K  ञ्चशरद गुप्ता .   वाराणसी     दोपहर   ढाई बजे। समाजवादी पार्टी उम्मीदवार और प्रदेश के प्राथमिक शिक्षा मंत्री कैलाश चौरसिया $फोन पर बताते हैं कि वे क्षेत्र में चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं और मैं उनसे रात नौ बजे के बाद ही संपर्क करूं। पांच मिनट बाद ही सिगरा से गुज़रते हुए सपा के केंद्रीय चुनाव कार्यालय पर नज़र पड़ती है। मैं रुक जाता हूं। तीन-चार गाडिय़ां खड़ीं हैं और कुछ सुरक्षाकर्मी भी। बताते हैं - मंत्रीजी अंदर आराम कर रहे हैं।   बसपा की हालत भी इससे कोई बेहतर नहीं है। शाम चार बजे बसपा प्रत्याशी विजय जायसवाल चार समर्थकों के साथ कार्यालय में बैठे मिले। लेकिन दावा जीत का ही है। कहते हैं - दलित, मुसलमान और पिछड़ा वोट मुझे ही मिल रहा है। पिछले बीस साल से उत्तरप्रदेश पर बारी-बारी से राज कर रहे इन दलों का यह हाल इसलिए है क्योंकि वाराणसी से इस बार भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी लड़ रहे हैं। भले ही मोदी चुनाव की घोषणा के बाद एक बार भी बनारस नहीं आए हैं, लेकिन वे हर जगह मौजूद हैं। बातचीत में, बहस में और हंसी-ठिठोली में भी। उनके $िखला$फ लड़ रहे आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल चार दिन पहले ही यहा पहुंचे हैं। पहले दिन शहर के प्रमुख लोगों से मुला$कात और जनता से एक संवाद के बाद वे गांवों की धूल फांक रहे हैं। गांवों में चौपाल लगाने के बाद उनका वहीं रुकने का कार्यक्रम भी है। हर जगह पहले पांच-दस मिनट में अपनी बात रखते हैं और फिर जनता के सवालों के जवाब देते हैं। बताते हैं कि वे राजनीति में क्यों आए? कैसे दिल्ली के चुनावों में उनका म$खौल उड़ाया गया? क्यों इस्ती$फा देना पड़ा और क्यों बनारस से चुनाव लडऩे आए? वाराणसी शहर के संवाद में जरूर एक-दो सवाल रिटेल में एफडीआई, विदेश नीति, मुसलमानों के प्रति झुकाव जैसे विषयों पर भी थे।     शेष पेज २ पर     हर सभा में उनके कार्यकर्ता पहले ही जाकर लोगों को पर्चियां बांट देते हैं। मनीष सिसोदिया या संजय सिंह मंच पर उन सवालों को पढ़ते हैं और केजरीवाल को जवाब देते हैं। केजरीवाल मोदी पर प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रहार करते हैं। अंबानी, अडानी से संबंध बताते हैं। फिर कहते हैं - मैं दूसरे नेताओं की तरह नहीं हूं कि हेलीकॉप्टर से उतरा, भाषण दिया और फिर फुर्र। आज तक किसी नेता ने आपकी बात सुनी है? किसी ने आपका दुख-दर्द बांटने का प्रयास किया है? लोगों के लिए यह नए $िकस्म की राजनीति है। लेकिन अधिकतर सुनते हैं और चल देते हैं। रिएक्ट नहीं करते। सिर्फ रिक्शे वालों, पटरी दुकानदारों को छोड़कर जिन्होंने आप की टोपियां पहन रखी हैं। शहर के संवाद से निकलते हुए एक युवा व्यवसायी देवेन्द्र सिंह कहते हैं - मैंने कुछ दिन यह टोपी पहनी थी। लेकिन पाया कि मेरे प्रति लोगों की निगाहें बदल गई थीं। जिन लोगों में पहले मुझसे नज़रें मिलाने की हिम्मत तक न थी, वे पान दुकान पर मुझे देखकर मुस्कुराते थे। पीठ पीछे कटाक्ष करते थे। मैंने टोपी तो उतार दी, लेकिन उत्सुकतावश केजरीवाल को सुनने आया था।   बनारस में पान और चाय की दुकान का $खास महत्व है। आधी राजनीति यहीं से चलती है। $खासतौर पर सवर्णों की। बाबू साहब एक घंटे चाय पीते हुए राजनीतिक प्रवचन देते हैं। फिर अगले एक घंटे पान की दुकान पर। गैऱ विचारधारा या पार्टी वाले की खिल्ली उड़ाना उनका प्रिय शग़ल है। इस शहर में अधिकतर लोग $फुर्सत में दिखते हैं इसीलिए आधा समय चाय और पान की दुकान पर अड़ी लगाने (अड्डेबाज़ी) में बिताते हैं। यहां कवि होते हैं, साहित्यकार, प्रोफ़ेसर और विज्ञानी भी। सुफ़ेद दाढ़ी वाले इकरामउल्लाह सलाह देते हैं - आप किसी से कुछ पूछना मत। बस किसी भी अड़ी पर चुपचाप सुनो। बनारस की राजनीति के रस का पूरा निचोड़ मिल जाएगा।   बीएचयू में राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर कौशल किशोर मिश्र कहते हैं - बनारस शहरों का राजा कहलाता है। यहां का हर बाशिंदा राजा है या गुरु है। बातचीत में एक दूसरे को राजा या गुरु कहकर बुलाते हैं। सब बराबर। सब विद्वान। इतने में एक रिक्शेवाला भाजपा की भगवा टोपी पहनकर निकलता है। मजमा देखकर वहीं से नारा लगाता है - रहा ना केऊ चक्कर मा। केऊ नहीं है टक्कर मा। तुरंत दूसरे रिक्शेवाले जवाबी नारा लगाते हैं - कस राजा। कहां जात बा। अभै तो शीला हारी है, अब मोदी की बारी है। $िफलहाल आम आदमी पार्टी ही वाराणसी में सबसे ज्यादा दिख रही है। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता अशोक पांडे इसे कुछ यूं समझाते हैं - देखिए, वे सब बाहरी हैं। बनारस से उनका कोई नाता नहीं है। न वे किसी को जानते हैं। वे होटलों में रह रहे हैं और सड़कों पर घूम रहे हैं। इसलिए ज़्यादा दिख रहे हैं। हमारे कार्यकर्ता एक-एक आदमी को जानते हैं। उनके घरों को जानते हैं। पारिवारिक रिश्ते हैं हमारे। इसलिए हमारे कार्यकर्ता सड़कों पर नहीं हैं। इतना जनसमर्थन है तो डॉ. मुरली मनोहर जोशी पिछली बार केवल 17 हज़ार वोटों से ही क्यों जीते? पांडे कहते हैं - 2009 में मा$िफया सरगना मुख्तार अंसारी ने चुनाव को सांप्रदायिक कर दिया था। इस बार मोदीजी कम से कम चार लाख वोटों से जीतेंगे। इतना भरोसा तो भाजपा ने अपना दल को दो सीटें क्यों दे दीं? पांडे कहते हैं - अपना दल की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल वाराणसी लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली रोहनिया सीट से विधायक हैं। वे मोदीजी का समर्थन करना चाहती थीं। यहां उनके सजातीय कुर्मी वोट लगभग तीन लाख हैं। इसलिए हमने समझौता कर लिया।     वे समर्थन दें रही थीं तो दें देतीं, भाजपा ने उन्हें मिजऱ्ापुर और प्रतापगढ़ सीटें क्यों दीं? क्या मोदीजी को जीतने में कोई संदेह था कि कुर्मी वोटों के लिए अपना दल से समझौता करना पड़ा? अब यह तो वरिष्ठ नेताओं के स्तर पर तय हुआ है। हमें अपना दल के समर्थन की वजह से वाराणसी ही नहीं, आधा दर्जन और सीटों पर कुर्मी वोटों का $फायदा होगा। यानि भाजपा को भी जातिवादी राजनीति से कोई परहेज़ नहीं है? और जिस तरह आपके राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने शिया और सुन्नी धर्मगुरुओं से समर्थन मांगा उससे ज़ाहिर है कि भाजपा को सांप्रदायिक राजनीति से भी गुरेज़ नहीं है? पांडे जवाब देने से हिचकिचाते हैं। फिर धीरे से कहते हैं - राजनीति को केवल काले और सफ़ेद में नहीं देख सकते। अलग मौसम और परिस्थिति के लिए अलग रंग चुनना ही पड़ता है।   उधर, कांग्रेस के उम्मीदवार अजय राय भाजपा और सपा नेताओं में मैच-$िफक्सिंग का आरोप लगाते हैं। कहते हैं - सपा प्रत्याशी चौरसिया का बनारस से कोई नाता ही नहीं रहा है। वे पास के मिजऱ्ापुर से विधायक बने थे। लेकिन टिकट वाराणसी से दिया गया। वहीं वाराणसी में आने वाली सेवापुरी के विधायक सुरेन्द्र सिंह पटेल को मिजऱ्ापुर से टिकट दिया गया है। सिंचाई और सार्वजनिक राज्यमंत्री पटेल को वाराणसी के कुर्मियों में अच्छा सपोर्ट है जबकि मिजऱ्ापुर में चौरसिया को अच्छा समर्थन है। राय कहते हैं - मुलायम सिंह ने एक ही झटके में वाराणसी से मोदी और मिजऱ्ापुर से अनुप्रिया पटेल, दोनों की जीत सुनिश्चित कर दी। -----------------------------------------
 
 
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