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बेहद महंगी   इसकीदवा दो से तीन साल तक लेनी पड़ सकती है जिसका खर्च अमूमन दो-तीन लाख रुपए तक आता है। हालांकि सरकारी अस्पतालों में अब इसका इलाज मुफ्त हो रहा है।   साइडइफेक्ट   कईदवाएं मिलाकर खाने से शरीर पर भारी दुष्प्रपभाव पड़ने लगता है। दवाओं से मरीज ठीक हो भी जाए तो वह कोई काम करने लायक नहीं रह जाता।   कष्टदायकप्रक्रिया   दवाओंके साथ छह से नौ माह तक रोज एक इंजेक्शन भी लेना पड़ता है। यह कष्टदायक और लंबी प्रक्रिया है इसलिए कुछ मरीज कई बार बीच में ही इलाज बंद कर देते हंै।   खतरानहीं टलता   इसकोर्स के बावजूद मरीज के जिंदा रहने की संभावना 50 फीसदी ही होती है। घर परिवार के दूसरे सदस्यों को भी यह बीमारी होने की आशंका बनी रहती है।  करीब पांच एकड़ छह डिसमिल जमीन पर बने इस स्कूल की स्थापना वर्ष 1922 के आसपास तीन शिक्षक खेतरो सुवर्णो, चौधरी सर एवं एक और शिक्षक ने मिलकर की थी। उस समय प्राइमरी सेक्शन ही यहां चलता था। इसके बाद वर्ष 1949 में इस स्कूल को हाई स्कूल के रूप मान्यता तो मिली लेकिन कोठारी कमीशन के तहत डिफरेंस आॅफ पे के हिसाब से शिक्षकों को काम करना पड़ा। 1962 में इस विद्यालय को पूरी तरह से मान्यता मिली। उस वक्त यहां के प्रिंसिपल पीएल राबिन्सन पहले हेड मास्टर बने। इसके बाद बीएएलएस मल सबसे दमदार प्रिंसिपल के रूप में बने। इनका नाम आज भी स्कूल के इतिहास के स्वर्णाक्षर में लिखा जाता है। उनके बाद डा. हेजिकल प्रसाद, फिर बी प्रसाद और उनके बाद पीएल मसील प्रिंसिपल बने। उनके बाद एलएल महतो, बी टिर्की और फिलहाल एम जोसेफ प्रिंसिपल हैं। लेकिन अल्पसंख्यक विद्यालय होने के बाद भी मिशन की ओर से इस पर विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा है। इस वजह से इसकी रौनक समाप्त होते जा रही है।  ^25 दिसंबर से 10 जनवरी तक अंडमान निकोबार समेत कुछ अन्य जगहों कि टिकट हाउसफुल है। कुछ एयरलाइंस के पास एक-दो सीट ही उपलब्ध है। ऐसे में इन जगहों के टिकट के दाम काफी बढ़ गए हैं। इसके साथ ही केरल और गोवा समेत कुछ अन्य जगहों की ट्रिप में धनबाद से संबंधित शहर तक की यात्रा को नहीं जोड़ा गया है। क्योंकि अलग-अलग लोगों की यात्रा का माध्यम भी अलग-अलग होता है।  भरतअखैरामका, निदेशक, श्रीश्याम ट्रेवल एजेंसी
 
 
 
 
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