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    वेल्लुर के डॉ देवाशीष दांडा ने बताया कि श्वास तंत्र की बीमारी के बाद यह दूसरे नंबर की सबसे बड़ी बीमारी हैं। इस बीमारी में बॉयलॉजिकल थेरेपी बहुत कारगर है लेकिन यह सिर्फ एक्सपर्टस द्वारा दी जा सकती है। इस बीमारी को मेडिकल के साथ सोशली भी समझना जरूरी है। डॉ आशीष बाड़ीका और डॉ सौरभ मालवीय कहते हैं कि हम हर दिन शहर में 30 -40 मरीज देखते हैं जो कुल जनसंख्या का मात्र 1 प्रतिशत हैं। समय के साथ लोगों में जागरूकता जरूर आई हैं पर आज भी लोग जोड़ो के दर्द में पहले घरेलू इलाज करते हैं फिर किसी पैथी की और जाते हैं इसके बाद भी फायदा ना होने पर घर के पास के फिजिशियन या दवाई की दूकान से दवाएं लेकर अपनी बीमारी बड़ा लेते हैं। जब शरीर में विकृति आ जाती है तब मरीज हमारे पास आते हैं, जिससे हमारी परेशानी बढ़ जाती हैं। लोगों को समय रहते जोड़ो के दर्द की गंभीरता को समझते हुए हमारे पास आना चाहिए।  किराना घराने के उस्ताद अब्दुल करीम खां साहब ने रागदारी के साथ ही नाट्य संगीत को बहुत लोकप्रिय किया। इस फॉर्म को भी उन्होंने साध लिया था। और फिर उनके बाद पंडित भीमसेन जोशी ने भी इसे लोकप्रिय किया है। लेकिन वे इसके साथ ही राग अभोगी कान्हड़ा, तोड़ी और मुलतानी गाते थे तो इसमें उनकी तबियत खिलती थी। उनकी तेज तानें, जबड़े वाली तानेंं, गमक, मींड और मुरकी के साथ सुरों का लगाव अद्वितीय था। उनके गायन की मेरे मन पर अमिट छाप है। मुझे भी राग तोड़ी बहुत पसंद है और इसके साथ ही मुलतानी, यमन और बिहाग मेरे प्रिय राग हैं।  हॉलीवुड में रिअलिस्टिक फिल्में बनाई जा रही   वे कहती हैं कि हाल ही में हॉलीवुड की फिल्म मैंने एक एस्ट्रोनॉट का रोल किया है। हॉलीवुड की फिल्मों में काम करना बेहद मुश्किल है। वहां का कॉम्पीटिशन का लेवल अलग है। हॉलीवुड की खासियत यह है कि यहां बहुत बेहतरीन और अलग अलग जॉनर में कहानियां लिखी जा रही हैं जो बहुत ही रिअलिस्टिक होती हैं। जबकि बॉलीवुड आज भी रोमांटिक और वास्तविकता से कोसों दूर फिल्में बना रहा है।  आइए इस बार चलें बाघ की गुफाएंं