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    फेक मार्किंग बंद होने से कम हुए 95% से ऊपर के स्कोरर्स   दो साल पहले की ही बात है। मेरे 80 स्टूडेंट्स को इंग्लिश में 95 मार्क्स मिले। एक जैसा स्कोर। मुझे हैरत हुई तो मैंने दूसरे शहरों के स्कूल प्रिंसिपल्स से बात की। वहां भी ऐसा हुआ था। अगले साल भी इसमें रिपीटेशन देखा। तब समझ में आया कि कहीं-कहीं फेक मार्किंग भी की जा रही है। स्कोर तो सुधरा लेकिन यह खतरनाक था। 2016 में टॉपर का स्कोर 96.8 था और इस साल 97.2 रहा। ग्रोथ है लेकिन गौरतलब यह है कि इस बार 95 फीसदी से ऊपर स्कोर करने वाले बच्चों की तादाद पहले से कम हुई। 10-12 बच्चे एक ही स्कोर पर होते थे। ऐसा इस बार नहीं हुआ। शायद फेक मार्किंग बंद या कम की गई है। यह तो समय के साथ ही पता चलेगा। अहमदाबाद, रायपुर सहित पांच बड़े शहरों के एजुकेशनिस्ट्स से मैंने बात की। हम सभी इस बात पर एकमत हैं।   एक और बात जिस पर गौर करना चाहिए वो यह कि टॉपर्स की तादाद कम होने के पीछे किसी भी स्टूडेंट को फेल न करने वाली पॉलिसी का बदलना है। पुरानी पॉलिसी के तहत किसी को भी फेल नहीं किया जा सकता था इसलिए बच्चों में एग्ज़ाम और पढ़ाई के प्रति गंभीरता कम हो गई। यह टेंडेंसी दूर होने में अभी दो साल और लगेंगे।   इस साल टॉपर कॉमर्स प्लस मैथ्स से हैं। पिछले ह्यूमेनिटी से टॉपर थी। मुझे इसके पीछे कोचिंग कल्चर बढ़ना बड़ी वजह लगती है। कॉमर्स और ह्यूमेनिटी़ज में कोचिंग का वैसा प्रेशर नहीं है जैसा हव्वा पीसीबी और पीसीएम के लिए बना रखा है। बच्चे कोचिंग को लेकर प्रेशर में आते जा रहे हैं। कोचिंगवाले उन्हें स्कूल से दूर रख रहे हैं।   - पुनीता नेहरू, प्रिंसिपल  परफेक्ट टाइमिंग के साथ संवेदनशील अभिनय   कहानी इतनीभर है कि एक बगीचे में मिस्टर मुरारीलाल यानी सतीश कौशिक, मिसेस मुरारीलाल यानी मेघना मलिक बैठे हैं और चौकीदार यानी अमित पांडे के उन्हें भगाने पर दोनों पति-पत्नी का नाटक करने लगते हैं। इसी दौरान तीनों अपनी-अपनी कहानियां सुनाते हैं और दर्शक जान पाते हैं कि मुरारीलाल असल में आर्मी में बावर्ची थे और बहन के तलाक और आत्महत्या करने के बाद अपने भांजों को पाला-पोसा है लेकिन अब अकेले हैं। मिसेस मुरारीलाल का पति हार्ट अटैक से मर चुका है और बेटे लंदन में हैं। चौकीदार अपने बेटे-बहू से अपमानित हैं। इन तीनों के बीच छोटे छोटे प्रसंग घटते हैं। और कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब दर्शक जान पाते हैं कि असल में मिसेस-मिस्टर मुरारीलाल तो बरसों पहले मर चुके हैं बैंच पर उनकी आत्माएं थी जो फिल्मी गाने गाते हुए, अपने दु:ख से उबरते हुए मोहब्बत का पैग़ाम देते हैं।