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तीन रोचक बातें इस बार फेस्ट को अलग रंग दे गईं  सेशन : नेपाल: इन सर्च ऑफ कांस्टीट्यूशन   काई बर्ड, प्रशांत झा, पुष्पेश पंत, वैन्यू: बैठक संस्कृति में जहर घोल रहे हैं पॉलिटिकल ईडियट्स  टरेचर फेस्ट में जायकों की एक अलग ही दुनिया थी। मैक्सीकन, कॉन्टिनेंटल, इटेलियन व्यंजनों के साथ देशी व्यंजनों का जादू। ऐसे में अफगानिस्तान के फ्रंटियर पर स्थित डेरा इस्माइल खान के शाकाहारी व्यंजनों पर आधारित किताब के रिलीज के दौरान कई रोचक बातें सामने आईं।   मुगल बादशाह हुमायूं ने ईरान से सोहन हलवा बनाने के लिए कारीगर डेरा इस्माइल में बसाया। पार्टीशन के बाद लजीज सोहन हलवा दिल्ली की गलियों में ऐसा रच-बस गया कि दिल्ली वाला हो गया।   जायके जुबान के जरिए यादों में सवार होकर लोगों को बांध लेते हैं। खाना बनाना, खिलाना तहजीब का हिस्सा है। मुल्कों की किस्मत तय करने वाले फैसले भी दस्तरखान पर ही लिए जाते थे। घरों की बात करें तो मां के हाथ का खाना कभी भुलाया नहीं जाता। और ही भूलती है उनकी ममता जो उंगुलियों के पोरों से होती हुई खाने में बस जाती है।   एक्सपर्ट प्रो. पुष्पेश पंत के अनुसार खान-पान सभी दायरों और सरहदों से आजाद है। जानते हैं हिंदुस्तान के नाश्ते में शुमार पूड़ी, कद्दू, हलवा और चने कहां से आए? पूड़ी हिंदुस्तानी है तो हलवा ईरानी। समोसा संबूशा से लिया गया है जो ईरान से आया था। हलवा अरब की सरहदों को धुंधलाता हुआ पहुंचा। जिस पान के बिना हमारा खाना पूरा नहीं होता, वह साउथ ईस्ट एशियन है। वहीं पुलाव सेंट्रल एशिया के उज्बेकिस्तान के रंग और जायके लेकर हमारी थाली का अटूट हिस्सा बन गया।  लिट लवर्स के निराले अंदाज
 
 
 
 
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