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जमशेदपुर, सोमवार, 27 अक्टूबर, २०१४  रा जन्म केरल के पट्‌टाम्बी जिले में हुआ। पढ़ाई के लिए मैं अपनी बहन के पास कोझीकोड में रहा करता था। बचपन से ही ट्रेनों के प्रति काफी आकर्षित था। पटरियों पर आती जाती ट्रेन मुझे रोमांचित करती थी। आज भी मुझे ट्रेन का अपना पहला सफर याद है। यह बात 1940 की है जब पट्‌टम्बी से कोझीकोड के बीच का सफर मैंने अपने पिताजी के साथ तय किया था। हमारे घर से स्टेशन 10 किलोमीटर दूर था और अलसुबह की ट्रेन पकड़ने के लिए यह दूरी हमें पैदल ही तय करनी थी, इसलिए हम घर से एक दिन पहले ही निकल गए और रात पिताजी के एक दोस्त के यहां बिताई। यह सफर वाकई विशेष था और यहीं से संभवत: ट्रेनों के प्रति मेरा आकर्षण एक पैशन में बदल गया। कोझीकोड में स्कूल में दाखिला लिया और बस पढ़ाई में रम गया। स्कूल और कॉलेज में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन मेरे क्लासमेट हुआ करते थे। अपने जिले से इंजीनिरिंग की परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले हम दो ही उम्मीदवार थे। मैंने इंजीनियरिंग के लिए काकीनाडा की जवाहरलाल नेहरू टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया लेकिन शेषन ने इंजीनियरिंग की राह छोड़ मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में प्रवेश लेने का फैसला किया। मैंने कुछ वक्त तक मैंने कोझिकोड के पॉलिटेक्निक इंस्टीट्यूट में पढ़ाया और फिर इंडियन रेलवे ज्वॉइन कर लिया।  स्कॉलरशिप  अपने पूरे समय में से दो तिहाई वक्त का उपयोग पढ़ाई के लिए करें। अन्य दो तिहाई का इस्तेमाल उस पढ़ाई को सीखने, अभ्यास करने और खुद को परखने के लिए करें। हमारा मस्तिष्क काम करके सीखता है कि सिर्फ सुनकर। उदाहरण के लिए अगर आपको एक पैसेज याद करना है तो अच्छा होगा कि आप अपने वक्त का 30 प्रतिशत हिस्सा इसे पढ़ने में खर्च करें और अन्य 70 प्रतिशत अपनी नॉलेज को परखने में बिताएं।
 
 
 
 
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