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    चूचू टीवी नर्सरी राइम्स एंड किड्स सॉन्ग   बेटीके लिए बनाया पहला वीडियो  लाइलाज बीमारी, 10 साल का मासूम घुटनों के बल  संतोष ठाकुर | नई दिल्ली, समीर राजपूत | अहमदाबाद, अजय कुमार सिंह | पटना   देशमें सीजेरियन डिलीवरी की संख्या तेजी से बढ़ी है। इसका एक बड़ा कारण है कि पैसों के कारण डॉक्टर्स प्रसूताओं को ऑपरेशन की सलाह देते हैं। जबकि यह केवल जेब के लिए ही नहीं बल्कि होने वाले बच्चे और मां दोनों की सेहत के लिए खतरनाक है। हाल ही में महिलाओं का दर्द एक बार फिर तब सामने आया जब चेंज.ओआरजी पर चलाए गए एक ऑनलाइन ज्ञापन पत्र पर करीब डेढ़ लाख महिलाओं ने सीजेरियन ट्रेंड पर चिंता जताते हुए इस पर नियमन की मांग की। भास्कर से इस बारे में बात करते हुए केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी कहती हैं कि इन दिनों सीजेरियन केस आम हो गए हैं। हम केवल सीजेरियन पर जोर देने वाले डॉक्टरों के नाम भी सार्वजनिक करने के पक्ष में हैं। जिससे जनता समझ पाए कि वह डॉक्टरी जैसे पवित्र पेशे के साथ कैसी बदनामी जोड़ रहे हैं। इससे लोगों को ऐसे डॉक्टर्स से बचने में सहायता मिलेगी।   संभव है कि यह दैनिक जीवनशैली में आए बदलाव से भी जुड़ा हो। लेकिन अस्पतालों में खासकर निजी अस्पतालों में जिस अनुपात में सीजेरियन केस हो रहे हैं वह केवल जीवनशैली बदलने से जुड़ा नहीं लगता है। यह एक तरह की गड़बड़ी की ओर भी संकेत करता है। यही वजह है कि हमनें स्वास्थ्य मंत्रालय को लिखा है कि वह अस्पतालों के लिए यह जरूरी करे कि वह अपने यहां पर होने वाली नॉर्मल डिलीवरी और सीजेरियन केस को अलग-अलग एक बोर्ड में दर्शाए, जिससे वहां प्रसव के लिए आने वाले परिवारों को यह पता चल पाए कि वहां पर प्रसव में नॉर्मल और सीजेरियन का क्या आंकड़ा है। इसके लिहाज से वह निर्णय कर पाएंगे कि उन्हें कहां पर प्रसव के लिए जाना चाहिए। मेनका गांधी कहती हैं कि हम यह भी चाहते हैं कि अस्पताल अपनी वेबसाइट पर भी यह बताएं और संभव हो तो सरकारी एजेंसी स्वयं राज्य, क्षेत्रवार तरीके से इसे किसी वेबसाइट पर बताए।   इस मामले में बात करने पर मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडियाा की प्रमुख जयश्री बेन मेहता ने कहा कि हम नियम बनाने वाली संस्था नहीं है। हम नियामक प्राधिकरण हैं। अगर सरकार किसी तरह का नियम बनाती है तो हम उसके अनुपालन को तय करते हैं।   मुंबई की रहने वाली सुर्वणा घोष जिनके ऑनलाइन ज्ञापन के बाद यह बहस का मुददा बना है, उन्होंने कहा कि असल में वह स्वयं सीजेरियन प्रसव पीड़ा से गुजर चुकी हैं। अस्पतालों में प्रसव के दौरान स्त्री या उसका परिवार ऐसी स्थिति में होता है जब वह डॉक्टर की सलाह को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। चाहे फिर यह सही हो या फिर गलत हो। निजी अस्पतालों में कहा जाता है कि सीजेरियन दर्द रहित है। यह आपके लिए जरूरी है। स्थिति ऐसी होती है कि आप उसे मना नहीं कर सकते हैं। यही नहीं, कई अस्पताल जब इससे संबंधित फॉर्म भरवाते हैं तो उसमें लिखते हैं कि स्त्री या उसके परिवार ने इसे चुना है। जबकि यह उनकी सलाह पर किया गया होता है। लोग इसे चुनते नहीं है। शेष|पेज15 पर       ऐसेमें हमनें इस पर एक अभियान चलाने का निश्चय किया और हमारी मांग सिर्फ इतनी है कि अस्पताल यह बताएं कि उनके यहां पर कितने सीजेरियन केस हैं और कितने नॉर्मल प्रसव के केस हैं। घोष ने कहा कि हैदराबाद के एक अस्पताल के अलावा सीताराम भरतिया अस्पताल ने इसको लेकर पहल की है। हम उसका धन्यवाद करते हैं। हम चाहते हैं कि इस मुददे को डॉक्टरोंं से जोड़ जाए बल्कि महिलाओं के हित से जोड़कर देखा जाए। यह महिलाओं से जुड़ा मसला है। जयपुर की सीनियर गायनोकोलॉजिस्ट डॉ. नीलम बाफना कहती हैं कि कई बार बच्चे की स्थिति ऐसी होती है कि सीजेरियन डिलीवरी करनी पड़ती है। यदि सरकार को ऐसा लगता है कि सीजेरियन डिलीवरी बहुत अधिक और जानबूझकर कर की जा रही हैं तो दोनों डिलीवरी (सीजेरियन और नार्मल) की कीमत एक ही कर देनी चाहिए। सीजेरियन डिलीवरी अधिक की एक वजह यह भी है कि यदि किसी महिला के पहला बच्चा सीजेरियन होता है तो दूसरा भी सीजेरियन ही कराने पर जोर रहता है जबकि दूसरे बच्चे की नार्मल डिलीवरी हो सकती है।  43 करोड़ किलो   अनुमानित दूध का उत्पादन देश में प्रतिदिन होता है।  हिंदुस्तानी गन्नों की मिठास खींच लाती है बॉर्डर के इन गांवों में  एक दर्जन गांवों में तीन महीने में मिलेगा फ्री वाई-फाई  7.6 किमी लंबा चीन का पहला एलिवेटेड साइकिल ट्रैक  कल नो निगेटिव न्यूज के साथ करें   नए सप्ताह की पॉजिटिव शुरुआत