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समय केसाथ जीवन और उसके रंग बदलते रहते हैं ...नहीं बदलती तो होली के रंगों की वो रुमानियत, उमंग और खूबसूरत अहसास... जो जीवन के खालिसपन को बाहर लाता है। साल के बाकी दिन हम नाम, जाित, धर्म, पेशे, हैसियत, दूरी-नजदीकी, क्षेत्र और समाज की जंजीरों में उलझे रहते हैं। हमें पता भी नहीं होता कि हम एक-दूसरे से दूर हैं तो क्यों? जैसे ही होली आती है, अपने आप, जाने किस ताकत के रहते ये जंजीरें टूट जाती हैं। हमारे भीतर और बाहर के रंग एक जैसे हो जाते हैं। सच्चे समाजवाद की तरह हम सबका एक ही रंग हो जाता है...और यही है होली भास्कर भी एेसे ही सच्चे समाजवाद का पक्षधर है...  आज हम सबका एक ही रंग  एक दिन का सच्चा समाजवाद... होली  बांग्लादेश 6 विकेट से जीता  क्यों जरूरी है यही नहीं, सभी डॉक्यूमेंट्री दिखाना?  कार ओवरटेक करते वक्त पेड़ से टकराई बस, 5 मरे  कहां कमी रह गई, अब जान सकेंगे मेडिकल के स्टूडेंट्स  जकरबर्ग की मानें ...तो ये है एफबी में नौकरी का पैमाना  सरकार की कोिशश बेकार इंग्लैंड में डॉक्यूमेंट्री िदखाई  रेपिस्ट को जेल से खींच पीट-पीटकर मार डाला  जेबीटी : चौटाला पिता-पुत्र की सजा बरकरार  स्टेट प्लेयर पर तेजाब फेंकने के दोनों आरोपी िगरफ्तार  बावरा बीओआई के पहले डायरेक्टर  सुरक्षित भविष्य शुरुआत आज  10 लाख रुपए तक होम लोन के नियम हुए आसान
 
 
 
 
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