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    <b>िपता से जुड़ी हर बात जैसे भावना का प्रवाह है, लेकिन बेहद संयम के साथ इसे रफ़्तार मिलती है। यूं, जब-जब शब्द मिले तो एहसास की सफ़ेद पीठ पर जज़्बात के रंग उभर आए, लेकिन इत्तेफ़ाक़ ही है कि प्रेम, विरह, मां, देश जैसे विषयों पर जहां लेखकों की भावनाओं को किसी रोकथाम का सामना नहीं करना पड़ा, वहीं पिता के मुद्दे पर कम ही क़लम चली है। ऐसा होने के पीछे एक अटपटी सी सही पर दिलचस्प वजह है। पिता पर लिखना मुश्क़िल है, क्योंकि पिता ख़ुद ही अपनी भावनाओं को कब उजागर होने देते हैं? वे एहसास जज़्ब किए रहते हैं। वे भावनाएं ज़ब्त किए रहे, तो उन पर लिखते वक़्त शब्द भी ठहर से गए। ज़ाहिर है, बाकी सब विषयों पर जिस सरलता से (भावनाओं को निर्बाध गति से बहने की छूट के कारण) लिखाई-चिंतन-मीमांसा होती रही, पिता के बारे में चिंतन करते समय उसी तरह क़लम आगे न बढ़ पाई।   ज़्यादा पुरानी बात नहीं है। कुछ अरसा पहले ही बंटवारे की ज़मीन पर लिखी एक उर्दू कहानी पढ़ रहा था। लब्बोलुआब ये कि दंगाइयों के हाथ आए बाप-बेटे में से कोई एक ही जीवित लौट सकता है, लेकिन ये चयन उन्हीं दोनों को करना है- किसे जीवित बचकर निकलना है। समस्या दंगाइयों की नहीं, पिता-पुत्र की है। खेतों में घिरा पिता अंततः फ़सल का उदाहरण देकर बताता है, बेटा दरअसल फ़सल है और पिता फसल काटने के बाद वाली ठूंठ; जिसे बहरहाल ज़ाया ही होना है। बेटे के पास लहलहाती ज़िंदगी पड़ी है। ऐसे में उसे ही जीवित रहना चाहिए। ज़ाहिर है- बेटा जीवित बच जाता है और पिता ठूंठ की तरह ज़ाया होने की नियति का शिकार।   शब्दकोश का सबसे मज़बूत शब्द   पिता। शब्दकोश के शब्दों की मज़बूती के निर्धारण का कोई उपकरण यदि हो तो ये शब्द बिलाशक़ सबसे मज़बूत पाया जाएगा। अकारण नहीं कि पिता पर कविताएं भी कम हुईं, लेकिन जितनी भी हुईं, वहां उनके उपमान शैल, वृक्ष, बरगद, आकाश इत्यादि ही रहे। पिता नायक ही रहे अजात। सूक्तियों ने पिता को भले किशोरवाय बच्चों से मित्रवत आचरण की सीख दी हो मगर बच्चों के लिए पिता हमेशा नायक रहे। तभी तो वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल लिख पाते हैं-   सारी लड़ाइयां तुम लड़ते थे   और जीतता केवल मैं था।   पिता - जिसके पास हर सवाल का जवाब है। अलग-अलग माध्यमों से पिता का स्नेह समझाया जाता रहा है। कविताएं इसे अदृश्य मानती हैं। चंद्रकांत देवताले कितनी सरलता से यही बात कह जाते हैं कि-   तुम्हारी निश्चल आंखें/ तारों की सी चमकती हैं/   मेरे अकेलेपन के आकाश में/ प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता/ ईथर की तरह होता है।   सुविधाओं में न शामिल होते पिता   कविताओं में अदृश्य पिता कहानियों में आते ही परम्परागत रूप से त्यागी, सादा और परिवारोन्मुख हो जाते हैं। वो अपने लिए नहीं, परिवार के लिए जीने लगते हैं। उनकी सोच, उनकी सांसें, उनकी कमाई, उनकी इच्छा- सबकुछ बस उसके परिवार तक सीमित रह जाते हैं। सो आश्चर्य नहीं, जो ज्ञानरंजन कहानी ‘पिता में लिखते हैं- ‘चौक से आते वक़्त चार आने की जगह तीन आने और तीन आने में तैयार होने पर दो आने में चलनेवाले रिक्शे के लिए पिता घंटे-घंटे खड़े रहेंगे। धीरे-धीरे सबके लिए सुविधाएं जुटाते रहेंगे, लेकिन ख़ुद उसमें नहीं या कम से कम शामिल होंगे। पहले लोग उनकी काफ़ी चिरौरी किया करते थे, अब लोग हार गए हैं। जानने लगे हैं कि पिता के आगे किसी की चलेगी नहीं।   पिता हर हाल में ख़ैरख़्वाह हैं!   पिता बदलते नहीं हैं। बस उम्र के उस मरहले में, जहां उसकी दौड़-धूप का ज़िम्मा बच्चे के कंधे पर आ जाता है, वह मौन हो जाते हैं। इसीलिए स्वयं प्रकाश अपनी कहानी ‘पिता का समय के समापन वाक्य में लिखते हैं- ‘बार बार लगता है कि पिता ख़ुश नहीं हैं, क्योंकि यह उनका नहीं, मेरा घर है। लेकिन घर... या समय?   ...मगर यही स्नेह माध्यम बदलते ही दिखने लगता है। दिखने लगता है श्रव्य और दृष्ट के उस माध्यम में, जिसे हम सिनेमा कहते हैं। ये दिखने लगता है फिल्म ‘महानदी के उस दृश्य में, जहां अपनी बारह वर्षीय लापता बेटी को ढूंढता बाप उसे सोनागाछी के वेश्यालय के एक कमरे में पाता है और फिर बेटी को गोद में उठाए मौत के कुएं से बाहर भागता है। ये जानते हुए भी कि उस कुएं से भाग पाना तो क्या निकल पाना तक सम्भव नहीं है।   ‘गर्दिश का पिता, बेटे के करियर को लेकर चिंतित है, वो भी इस क़दर कि नाजायज़ चीजे़ं सहकर भी बच्चे को मारपीट से दूर रहने की सलाह देता है। पिता वो भी है, जो अपने बच्चे के फ़ेल हो जाने पर उसे ख़ानदान का नाम बनाए रखने के लिए शाबाशी देता है और पिता वो भी, जो बेटी के पसंद किए लड़के के पीछे जासूस लगवाता है।   पिता हर हाल में ख़ैरख़्वाह है।   बुढ़ाता पिता चौकस होने लगता है। पिता भी चूंकि इंसान है, इसलिए इंसान के गुण-दोषों से अछूता भी नहीं है। पुत्र मोह में आकर वो कभी महाभारत जैसे विनाशकारी युद्ध का भागी बनता है तो कभी सत्ता हस्तांतरण के मामलों में शुभचिंतकों की सलाह की अनदेखी करता है। ऐसा करते वक़्त भी उसे केवल बच्चे के भविष्य की चिंता रहती है। चिंता, पिता के मूल स्वभाव का अवयव है। इससे इतर उसकी उपस्थिति और सार्थकता बाकी नहीं बचती।   पिता प्रकट भावुकता से अलग, अंतर्निहित स्नेह का मज़बूत आवरण है, जिसकी उपस्थिति एकबारगी बच्चों को डराती, सकुचाती और थोड़ी दूर छिटकने को विवश करती है। बेटियां अपने स्नेह की गर्माहट से जैसे पिता को पिघला देती हैं, बेटे बहुधा नहीं कर पाते, लेकिन ये जानते तो दोनों ही हैं कि खुरदुरे स्वर के पार्श्व में मंगलकामना की मधुर धुन है और जिन सख़्त शब्दों में कुछ न करने की सीख और सलाहियत है, उसमें अपनी औलाद की हित-चिंता की ख़्वाहिश और आशंका ही सबसे प्रमुख कारक है।   पिता के होने जो आश्वस्ति औलाद को मिलती है, वह संसार में कोई और वस्तु नहीं दे सकती।</b><br>िपता से जुड़ी हर बात जैसे भावन... <b>ढूंढें मन का नगर</b><br>अलेक्सेंडर खिमूशीन का बचपन याक... <b>वाणी की मधुरता   सब जीत लेगी   हमारे ज्ञान स्रोत गवाह हैं कि वाणी बहुत शक्तिवान है।   वाणी का सार ॐ है। ॐकार की ध्वनि सारी नकारात्मकता को दूर कर सकती है। बस, एक शब्द और उसकी गूंज, भीतर भी, बाहर भी- सब बदल सकती है। इसके उच्चारण मात्र से परिवर्तन की अनुभूति प्राप्त की जा सकती है।   छांदोग्यपनिषद् के आधार में कहा गया है - वाणी, प्राण और ऋचा तथा साम (गायन) के संयोग से ॐकार का सृजन होता है।   ॐकार अनुभूतिजन्य है, जिसे अक्षरों के गायन में अनुभव किया जाता है।   इस उपनिषद् में देवासुर संग्राम का भी उल्लेख है, जो ॐकार के उच्चार में निहित शक्तियों की वजह से हुआ था। देव ॐ का उच्चार कर आसुरी शक्तियों को दूर रखने का प्रयास करते व असुर उस शक्ति के भय से उन्हें रोकने में जुट जाते। यही संग्राम का आधार था।   देखा जाए तो सारे संग्राम का आधार वही है- वाणी की मधुरता का कर्कश बोलों से संघर्ष। एक ईश्वरीय फ़रमान है, जिसके मुताबिक़ या तो मधुर बोलो या चुप रहो।   सच है। मनुष्य अपने मंतव्य को अभिव्यक्त करता भी तो वाणी से ही है। बहुत ताकत होती है इसमें। वाणी बहुत मज़बूती से जोड़ती है और बहुत बेदर्दी से तोड़ भी देती है। चंद शब्द सारी नेकियां दरकिनार कर सकते हैं। बाहर के सारे आकर्षण, सारे मुलम्मे, पल-भर में मांद पड़ सकते हैं- बस कड़वा बोलने भर की देर है।   बोल की शक्ति असीमित है। सदियां बोलती रही हैं, सहस्रों वर्षों से वाणी किसी न किसी रूप में व्यक्त होती रही है, लेकिन कोई यह नहीं कह सका है कि इसकी थाह पा ली है। वाणी में ॐकार की गूंज वह आरम्भ है, जिसे अब तक असंख्य हृदयांगनों ने अनुभूत किया है। यह मधुरता का एक किनारा है। यह प्रवाह का अथाह सागर है। ॐकार का है। इसमें प्राण है, वाणी की गूंज है। मधुरता का अनुभव है। सारे संघर्ष यहां, इस किनारे आकर थम जाते हैं।   मधुर बोल, यही तो करते हैं।</b><br>वातायन 
 <img src="images/p3.... 12 राज्य | 66 संस्करण | 4 भाषा... नया युग | नया विश्वास | नई ज़िं... प्रीत नगर की रीत यही है, जो खो... <bआवरण कथा 
 <img src="image... स्नेह में डूबा पिता का चेहरा ब... िपता से जुड़ी हर बात जैसे भावन... <b>वाणी की मधुरता   सब जीत लेगी   हमारे ज्ञान स्रोत गवाह हैं कि वाणी बहुत शक्तिवान है।   वाणी का सार ॐ है। ॐकार की ध्वनि सारी नकारात्मकता को दूर कर सकती है। बस, एक शब्द और उसकी गूंज, भीतर भी, बाहर भी- सब बदल सकती है। इसके उच्चारण मात्र से परिवर्तन की अनुभूति प्राप्त की जा सकती है।   छांदोग्यपनिषद् के आधार में कहा गया है - वाणी, प्राण और ऋचा तथा साम (गायन) के संयोग से ॐकार का सृजन होता है।   ॐकार अनुभूतिजन्य है, जिसे अक्षरों के गायन में अनुभव किया जाता है।   इस उपनिषद् में देवासुर संग्राम का भी उल्लेख है, जो ॐकार के उच्चार में निहित शक्तियों की वजह से हुआ था। देव ॐ का उच्चार कर आसुरी शक्तियों को दूर रखने का प्रयास करते व असुर उस शक्ति के भय से उन्हें रोकने में जुट जाते। यही संग्राम का आधार था।   देखा जाए तो सारे संग्राम का आधार वही है- वाणी की मधुरता का कर्कश बोलों से संघर्ष। एक ईश्वरीय फ़रमान है, जिसके मुताबिक़ या तो मधुर बोलो या चुप रहो।   सच है। मनुष्य अपने मंतव्य को अभिव्यक्त करता भी तो वाणी से ही है। बहुत ताकत होती है इसमें। वाणी बहुत मज़बूती से जोड़ती है और बहुत बेदर्दी से तोड़ भी देती है। चंद शब्द सारी नेकियां दरकिनार कर सकते हैं। बाहर के सारे आकर्षण, सारे मुलम्मे, पल-भर में मांद पड़ सकते हैं- बस कड़वा बोलने भर की देर है।   बोल की शक्ति असीमित है। सदियां बोलती रही हैं, सहस्रों वर्षों से वाणी किसी न किसी रूप में व्यक्त होती रही है, लेकिन कोई यह नहीं कह सका है कि इसकी थाह पा ली है। वाणी में ॐकार की गूंज वह आरम्भ है, जिसे अब तक असंख्य हृदयांगनों ने अनुभूत किया है। यह मधुरता का एक किनारा है। यह प्रवाह का अथाह सागर है। ॐकार का है। इसमें प्राण है, वाणी की गूंज है। मधुरता का अनुभव है। सारे संघर्ष यहां, इस किनारे आकर थम जाते हैं।   मधुर बोल, यही तो करते हैं।  <b><br>वातायन 
 <img src="images/p3.... <b>ढूंढें मन का नगर   <b><br>अलेक्सेंडर खिमूशीन का बचपन याक... <b>िपता से जुड़ी हर बात जैसे भावना का प्रवाह है, लेकिन बेहद संयम के साथ इसे रफ़्तार मिलती है। यूं, जब-जब शब्द मिले तो एहसास की सफ़ेद पीठ पर जज़्बात के रंग उभर आए, लेकिन इत्तेफ़ाक़ ही है कि प्रेम, विरह, मां, देश जैसे विषयों पर जहां लेखकों की भावनाओं को किसी रोकथाम का सामना नहीं करना पड़ा, वहीं पिता के मुद्दे पर कम ही क़लम चली है। ऐसा होने के पीछे एक अटपटी सी सही पर दिलचस्प वजह है। पिता पर लिखना मुश्क़िल है, क्योंकि पिता ख़ुद ही अपनी भावनाओं को कब उजागर होने देते हैं? वे एहसास जज़्ब किए रहते हैं। वे भावनाएं ज़ब्त किए रहे, तो उन पर लिखते वक़्त शब्द भी ठहर से गए। ज़ाहिर है, बाकी सब विषयों पर जिस सरलता से (भावनाओं को निर्बाध गति से बहने की छूट के कारण) लिखाई-चिंतन-मीमांसा होती रही, पिता के बारे में चिंतन करते समय उसी तरह क़लम आगे न बढ़ पाई।   ज़्यादा पुरानी बात नहीं है। कुछ अरसा पहले ही बंटवारे की ज़मीन पर लिखी एक उर्दू कहानी पढ़ रहा था। लब्बोलुआब ये कि दंगाइयों के हाथ आए बाप-बेटे में से कोई एक ही जीवित लौट सकता है, लेकिन ये चयन उन्हीं दोनों को करना है- किसे जीवित बचकर निकलना है। समस्या दंगाइयों की नहीं, पिता-पुत्र की है। खेतों में घिरा पिता अंततः फ़सल का उदाहरण देकर बताता है, बेटा दरअसल फ़सल है और पिता फसल काटने के बाद वाली ठूंठ; जिसे बहरहाल ज़ाया ही होना है। बेटे के पास लहलहाती ज़िंदगी पड़ी है। ऐसे में उसे ही जीवित रहना चाहिए। ज़ाहिर है- बेटा जीवित बच जाता है और पिता ठूंठ की तरह ज़ाया होने की नियति का शिकार।   शब्दकोश का सबसे मज़बूत शब्द   पिता। शब्दकोश के शब्दों की मज़बूती के निर्धारण का कोई उपकरण यदि हो तो ये शब्द बिलाशक़ सबसे मज़बूत पाया जाएगा। अकारण नहीं कि पिता पर कविताएं भी कम हुईं, लेकिन जितनी भी हुईं, वहां उनके उपमान शैल, वृक्ष, बरगद, आकाश इत्यादि ही रहे। पिता नायक ही रहे अजात। सूक्तियों ने पिता को भले किशोरवाय बच्चों से मित्रवत आचरण की सीख दी हो मगर बच्चों के लिए पिता हमेशा नायक रहे। तभी तो वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल लिख पाते हैं-   सारी लड़ाइयां तुम लड़ते थे   और जीतता केवल मैं था।   पिता - जिसके पास हर सवाल का जवाब है। अलग-अलग माध्यमों से पिता का स्नेह समझाया जाता रहा है। कविताएं इसे अदृश्य मानती हैं। चंद्रकांत देवताले कितनी सरलता से यही बात कह जाते हैं कि-   तुम्हारी निश्चल आंखें/ तारों की सी चमकती हैं/   मेरे अकेलेपन के आकाश में/ प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता/ ईथर की तरह होता है।   सुविधाओं में न शामिल होते पिता   कविताओं में अदृश्य पिता कहानियों में आते ही परम्परागत रूप से त्यागी, सादा और परिवारोन्मुख हो जाते हैं। वो अपने लिए नहीं, परिवार के लिए जीने लगते हैं। उनकी सोच, उनकी सांसें, उनकी कमाई, उनकी इच्छा- सबकुछ बस उसके परिवार तक सीमित रह जाते हैं। सो आश्चर्य नहीं, जो ज्ञानरंजन कहानी ‘पिता में लिखते हैं- ‘चौक से आते वक़्त चार आने की जगह तीन आने और तीन आने में तैयार होने पर दो आने में चलनेवाले रिक्शे के लिए पिता घंटे-घंटे खड़े रहेंगे। धीरे-धीरे सबके लिए सुविधाएं जुटाते रहेंगे, लेकिन ख़ुद उसमें नहीं या कम से कम शामिल होंगे। पहले लोग उनकी काफ़ी चिरौरी किया करते थे, अब लोग हार गए हैं। जानने लगे हैं कि पिता के आगे किसी की चलेगी नहीं।   पिता हर हाल में ख़ैरख़्वाह हैं!   पिता बदलते नहीं हैं। बस उम्र के उस मरहले में, जहां उसकी दौड़-धूप का ज़िम्मा बच्चे के कंधे पर आ जाता है, वह मौन हो जाते हैं। इसीलिए स्वयं प्रकाश अपनी कहानी ‘पिता का समय के समापन वाक्य में लिखते हैं- ‘बार बार लगता है कि पिता ख़ुश नहीं हैं, क्योंकि यह उनका नहीं, मेरा घर है। लेकिन घर... या समय?   ...मगर यही स्नेह माध्यम बदलते ही दिखने लगता है। दिखने लगता है श्रव्य और दृष्ट के उस माध्यम में, जिसे हम सिनेमा कहते हैं। ये दिखने लगता है फिल्म ‘महानदी के उस दृश्य में, जहां अपनी बारह वर्षीय लापता बेटी को ढूंढता बाप उसे सोनागाछी के वेश्यालय के एक कमरे में पाता है और फिर बेटी को गोद में उठाए मौत के कुएं से बाहर भागता है। ये जानते हुए भी कि उस कुएं से भाग पाना तो क्या निकल पाना तक सम्भव नहीं है।   ‘गर्दिश का पिता, बेटे के करियर को लेकर चिंतित है, वो भी इस क़दर कि नाजायज़ चीजे़ं सहकर भी बच्चे को मारपीट से दूर रहने की सलाह देता है। पिता वो भी है, जो अपने बच्चे के फ़ेल हो जाने पर उसे ख़ानदान का नाम बनाए रखने के लिए शाबाशी देता है और पिता वो भी, जो बेटी के पसंद किए लड़के के पीछे जासूस लगवाता है।   पिता हर हाल में ख़ैरख़्वाह है।   बुढ़ाता पिता चौकस होने लगता है। पिता भी चूंकि इंसान है, इसलिए इंसान के गुण-दोषों से अछूता भी नहीं है। पुत्र मोह में आकर वो कभी महाभारत जैसे विनाशकारी युद्ध का भागी बनता है तो कभी सत्ता हस्तांतरण के मामलों में शुभचिंतकों की सलाह की अनदेखी करता है। ऐसा करते वक़्त भी उसे केवल बच्चे के भविष्य की चिंता रहती है। चिंता, पिता के मूल स्वभाव का अवयव है। इससे इतर उसकी उपस्थिति और सार्थकता बाकी नहीं बचती।   पिता प्रकट भावुकता से अलग, अंतर्निहित स्नेह का मज़बूत आवरण है, जिसकी उपस्थिति एकबारगी बच्चों को डराती, सकुचाती और थोड़ी दूर छिटकने को विवश करती है। बेटियां अपने स्नेह की गर्माहट से जैसे पिता को पिघला देती हैं, बेटे बहुधा नहीं कर पाते, लेकिन ये जानते तो दोनों ही हैं कि खुरदुरे स्वर के पार्श्व में मंगलकामना की मधुर धुन है और जिन सख़्त शब्दों में कुछ न करने की सीख और सलाहियत है, उसमें अपनी औलाद की हित-चिंता की ख़्वाहिश और आशंका ही सबसे प्रमुख कारक है।   पिता के होने जो आश्वस्ति औलाद को मिलती है, वह संसार में कोई और वस्तु नहीं दे सकती।  <b><br>िपता से जुड़ी हर बात जैसे भावन...
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    magazine Rasrang hindi ePaper 06 January, 2013 page 1
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    06 January, 2013 Rasrang ePaper Online. Get all the latest news about the Rasrang on the most popular online Hindi News Paper Dainik Bhaskar: Page 1
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