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न 1965 का युद्ध पाकिस्तान के विदेश मंत्री ज़ुल्फि़क़ार अली भुट्टो की महत्वाकांक्षा का नतीजा था। उन्होंने पाकिस्तानी प्रेसिडेंट(तब) अयूब ख़ान को समझाया कि हम अगर कश्मीर में घुस जाते हैं तो वहां की जनता हमारा साथ देगी। जंग की नौबत तक नहीं आएगी। उन्होंने मई में ऑपरेशन जिब्राल्टर तैयार किया अौर जुलाई के पहले हफ्ते में एक्शन करते हुए कश्मीर में घुसपैठ कर दी। वहां की जनता को ये पता तक नहीं था, उनका साथ देना तो बहुत दूर की बात थी। मोहम्मद्दीन गूजर वह शख्स था जिसने पहली बार तंगमर्ग के पास कुछ संदेहास्पद लोगों के होने की खबर स्थानीय पुलिस को दी। हम सक्रिय हुए। इसके साथ ही पाकिस्तान ने ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम लॉन्च कर दिया और जम्मू के अखनूर सेक्टर में एडवांसमेंट की।   एअरफ़ोर्स ने अब तक कमान संभाल ली थी और इधर जीओसी वेस्टर्न कमांड ले. जन. हरबख्श सिंह ने योजना बनाकर पाकिस्तान का ध्यान जम्मू से हटाने का काम शुरू कर दिया। वे पंजाब फ्रंट खोलना चाहते थे क्योंकि पाकिस्तानी इधर खेमकरण तक आ चुके थे। जनरल हरबख्श ने भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से अखनूर को बचाने के लिए इंटरनेशनल बॉर्डर पार करने की इजाज़त मांगी। यह बड़ा साहसिक क़दम था, लेकिन शास्त्री जी ने तुरंत हां कर दी। इसके बाद भारतीय सेनाएं खेमकरण में बढ़ रही पाकिस्तानी फोर्सेस को रोकने लिए दीवार की तरह खड़ी हो गईं।   पाकिस्तान के पास बहुत विकसित अमेरिकी पैटन टैंक थे। सेबर जेट थे। अहंकार था लेकिन हमारे पास जज्बा था। खेमकरण के असल उत्तर गांव में टैंकों की खतरनाक लड़ाई हुई। यहीं हमारे जवान अब्दुल हमीद ने रिकॉयललेस जीप से ही दुश्मन के टैंक उड़ा डाले। हमने उन्हें खदेड़ा और खेमकरण वापस ले लिया। यह गांव पैटन टैंकों की क़ब्रगाह बन गया। 1965 की जंग का शहीदों के अलावा अगर कोई हीरो है तो वह हैं ले.जन. हरबख्श सिंह। उन्होंने सही वक्त पर सही फ़ैसले लिए और जीत को अपनी तरफ मोड़ने की हिम्मत दिखाई। इस युद्ध के दौरान मैं उनका एडीसी था। हर फ्रंट को क़रीब से देखा। जब हम घायल सैनिकों को देखने गए तो एक मेजर जिनका जबड़ा और कंधा बुरी तरह ज़ख्मी था-इशारे से बोले कि मैं ठीक हूं और कल रेजिमेंट लौट रहा हूं। ऐसे कई सैनिक थे जो ज़ख्मी होने के बावजूद फ्रंट छोड़ने को तैयार नहीं थे। 23 सितंबर 1965 को सीज़फ़ायर हो गया। दोनों देशों की सेनाएं शांत हो गईं। इसके बाद जनवरी 1966 में ताशकंद समझौता हुआ। हमने जो जीत युद्ध के मैदान में हासिल की थी उसे ताशकंद में एक तरह से गंवा बैठे। हाजीपीर और कश्मीर के अन्य इलाक़े जो हमारे कब्जे़ में थे, उन्हें हमें वापस करना पड़ा। अगर इस शर्त को ताशकंद समझौते मंे न माना गया होता तो जो घुसपैठ कश्मीर में हम आज देखते हैं वह संभव न होती। यह कहा जा सकता है कि पाकिस्तान का प्लान अच्छा था पर एक्जीक्यूशन पुअर। भारत युद्ध के लिए तैयार नहीं था लेकिन वक्त पड़ा तो हमारी आर्मी ने वो जवाब दिया कि वे भी क्या याद रखेंगे।   पेज-4 पर पढें, क्यों हाजीपीर का इलाक़ा वापस देना पड़ा...   (कै. अमरिंदर सिंह 1965 मंे जनरल हरबख्श सिंह के एडीसी थे)  <img src=images/p3.png<img src=images/p1.png>कहानी 1965 के युद्ध की <img src=images/p3.png<img src=images/p1.png>किस्से शौर्य व पराक्रम के   <img src=images/p3.png<img src=images/p1.png>बात शांति और समझौते की
 
 
 
 
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