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Change Magazine
 
देश की सबसे बड़ी वामपंथी पार्टी माकपा ने अपना नया नेता तो चुन लिया है लेकिन नीति वही पुरानी है। युवाओं के बदौलत नए भारत के निर्माण का खाका पेश करने वाली इस पार्टी के नेतृत्व में गिनती के काले बाल नहीं हैं। ऐसे में सवाल है कि क्रांित के सब्जबाग से संसदीय राजनीति के जोड़तोड़ के महारथियों में शामिल माकपा क्या आने वाले वर्षों में हाशिए के लोगों को वह दे पाएगी जिसका वादा वह 1964 से कर रही है।  किसी एक की आत्महत्या असल में हत्या ही होती है जिसमें पूरा समाज शामिल होता है, लाखों लाख लोगों के हाथ अचानक एक मासूम के खून से रंग जाते हैं।
 
 
 
 
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