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एक मंच, 5 राज्यों की नृत्य कलाएं  गिरावट में ओपेक और अमेरिकी फैक्टर  25%   भारतीयविंटर वैकेशन्स पर 50 हजार रुपए खर्च करते हैं।     34.9%  भारतीयऐसे हैं जो इन छुटि्टयों पर 25 हजार तक खर्च करते हैं।  रेल रिजर्वेशन चार्ट पर होगा टीटीई और टीसी का नंबर  बेटी की याद में पिता लगवाएंगे तीन गांव में वॉटर फिल्ट्रेशन प्लांट  पूर्व सांसद अमर सिंह ने सरकारी बंगले को मनचाहे बदलाव कर दिया लग्ज़री लुक।  {संध्या रविशंकर . चेन्नई  रातकेतीन बजे थे जब बेंगलुरु की 32 वर्षीय महिला के ब्रेन डेड होते ही उसके परिवार ने उसका हार्ट डोनेट करने की बात कही। यह सुनते ही सभी डॉक्टर्स ने अपनी जिम्मेदारी ले ली थी। हार्ट को ट्रांसप्लांट के लिए दूसरे मरीज तक बेंगलुरु से चैन्नई पहुंचाना था। हार्ट एयरपोर्ट तक चंद मिनटों में पहुंच जाए इसके लिए बेंगलुरु पुलिस ग्रीन कॉरिडोर बना चुकी थी। यानी रास्ते में कोई ट्रैफिक लाइट नहीं। चेन्नई में डॉक्टर्स सर्जरी की तैयारी में जुट गए थे। उधर एक फोन कॉल पर ही चेन्नई में हमेशा की तरह ग्रीन कॉरिडोर की तैयारी हो गई थी। फ्लाइट से हार्ट एक घंटे में चेन्नई पहुंच गया। उसके बाद जो कुछ हुआ उससे आप वाकिफ हैं। जो सामने नहीं आया वह यह है कि आखिर चेन्नई में ही ऐसा क्यों हो पाता है?   चेन्नई में यह अचानक नहीं हो रहा है। यह कल्चर डेवलप किया गया है। इसके ऊपर पूरा काम किया गया है। जैसे ही डॉक्टर्स को ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है, वे बस एक कॉल करते हैं और चेन्नई पुलिस आधे घंटे में ट्रैफिक रोक ग्रीन कॉरिडोर बना देती है। जंक्शन्स पर उनके इंस्पेक्टर मुस्तैद रहते हैं। ताकि कोई चूक हो। चेन्नई ट्रैफिक पुलिस के डेप्यूटी कमिश्नर संदानंदम इसे ड्यूटी से आगे ले गए। वे इसे भगवान की इच्छा बताते हैं। कमिश्नर खुद इसकी अगुआई करते हैं।   फोर्टिस मलार हॉस्पिटल में हार्ट फेल्योर और ट्रांसप्लांट सेंटर के डायरेक्टर डॉ. बालाकृष्णन कहते हैं, उन्हें इस ट्रांसप्लांट की काफी चिंता थी। पता था चेन्नई तो यह कर लेगा मगर बेंगलुरु को लेकर संशय था। क्या इतने ट्रैफिक में सही समय पर हार्ट एयरपोर्ट से हॉस्पिटल पहुंच पाएगा। क्योंकि ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे मरीज को ज्यादा देर खुला नहीं रख सकते इससे संक्रमण हो सकता था। मगर बेंगलुरु पुलिस ने भी चेन्नई की तरह ही ग्रीन कॉरिडोर सही तरह बना लिया। बीजीएस ग्लोबल हॉस्पिटल्स के वाइस चेयरमैन डॉ एन के वैंकटरामन कहते हैं यह सबकुछ पांच घंटे में करना होता है जिसमें सर्जरी का समय शामिल है। अब चेन्नई हार्ट और अन्य अंगों के ट्रांसप्लांट के लिए केंद्र बन चुका है। कैडेवर ट्रांसप्लांट यहां की विशेषता बन गई है। इसमें जीवित नहीं ब्रेन डेड व्यक्ति के शरीर के अंगों को ट्रांसप्लांट किया जाता है। 2008 में पहली बार इस तरह का ट्रांसप्लांट हुआ था।15 साल के हितेंद्रन को सड़क दुर्घटना के बाद ब्रेन डेड घोषित करते ही उसके परिवार ने अंगदान का निर्णय लिया था। मामले ने लोगों में अंगदान के लिए जागरुकता बढ़ा दी थी। ऑर्गन ट्रांसप्लांट के एक्स्पर्ट डॉ. के एम चेरियन ने दो साल की बच्ची पर ऐसा ही ट्रांसप्लांट किया था। जिसमें हार्ट को दो घंटे 52 मिनट में चेन्नई से बेंगलुरु पहुंचा दिया गया था। डॉ. के एम चेरियन कहते हैं, चेन्नई के इतनी आसानी से यह कर पाने के पीछे की वजह लोगों में जागरुकता है। तमिलनाडु में अंगदान का आंकड़ा 10 लाख की आबादी पर 1.8 है वहीं पूरे भारत में यह 0.26 है। चेरियन कहते हैं, वे पहले हैं जिन्होंने केंद्र से ट्रांसप्लांटेशन ऑफ 1994 में ह्यूमन ऑर्गन्स एक्ट बनवाने की पहल की थी। मनिपाल हॉस्पिटल के ग्रुप मेडिकल डायरेक्टर सुदर्शन बलाल कहते हैं दक्षिण भारत में ट्रांसप्लांटेशन को लेकर ज्यादा जागरुकता है। तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामाचंद्रन 1984 में किडनी ट्रांसप्लांट से गुजरे थे तभी से लोग जानते हैं कि आखिर ट्रांसप्लांटेशन क्या है। दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण सरकार के इस दिशा में किए गए प्रयास हैं। 2008 में तमिलनाडु सरकार ने कैडेवर ट्रांसप्लांट प्रोग्राम भी शुरू कर दिया था। जिससे ऑर्गन शेयरिंग रजिस्ट्री की शुरुआत हुई। अंगदान को बढ़ावा देने वाली मोहन फाउंडेशन के संस्थापक संस्थापक डॉ सुनील श्रॉफ बताते हैं 1990 से लगातार हुई कैंपेनिंग से तमिलनाडु के लोग जागरुक हुए हैं। यहां करीब 15 से 20 फीसदी डोनेशन लोग स्वेच्छा से करते हैं। साल 2000 से आठ प्रायवेट अस्पतालों ने ऑर्गन शेयरिंग नेटवर्क बना लिया है। मोहन फाउंडेशन को ऑर्गन शेयरिंग रजिस्ट्री के लिए सॉफ्टवेयर डिजाइन और मेंटेन करने की जिम्मेदारी दी गई। इस सॉफ्टवेयर में मरीज की डिटेल्स दी जाती हैं। राजस्थान और केरल भी इसी मॉडल को शुरू करना चाहते हैं।  पाली 28 दिसंबर, 2014
 
 
 
 
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