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क्यों आफ़त बन रही है बारिश?

अब तक क्यों लागू नहीं हो सका यह कानून?
2019-20
(स्रोत : जल संसाधन मंत्रालय )
2018-19
11.2
2017-18
15.6
2016-17
11.9
2019-20
1330
2018-19
2045
2017-18
2494
2016-17
1550
dainikbhaskar.com/rasrang
rasrang@dbcorp.in
{ इसे लागू न करने के पीछे वजह जनसंख्या दबाव और आजीविका के वैकल्पिक साधनों की कमी को माना जाता है। इसके अलावा जब यह कानून प्रस्तावित किया गया था, उस वक्त ग्लोबल वार्मिंग को भी लेकर सिर्फ अनुमान लगाया गया था। उसके वास्तविक प्रभाव को महसूस नहीं किया गया था। अब जबकि ग्लोबल वार्मिंग व जलवायु परिवर्तन वास्तविकता बन चुकी है तो ऐसे में मानवीय प्रवृत्तियों पर नियंत्रण के साथ ऐसे कानून भी बहुत जरूरी हो गए हैं।
क्या है यह कानून? क्यों रुक सकेगी इससे तबाही?
{ फ्लड प्लेन में कुछ जोन या क्षेत्र चिह्नित किए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए किसी राज्य में जोन-1, जोन-2, जोन-3 हैं। इनमें से जोन-1 एेसा क्षेत्र है जहां बाढ़ आने की संभावना न के बराबर है और जोन-3 मंे बाढ़ आने की बहुत ज्यादा आशंका है। तो जोन-1 में तो विकास कार्य संबंधी ज्यादा प्रतिबंध नहीं होंगे, लेकिन जोन-3 में विकास कार्य संबंधी कई नियमों का पालन करना होगा। इससे कम से कम भारी बारिश से होने वाले नुकसान को रोकना थोड़ा आसान हो जाएगा।
{ साल 1975 में फ्लड प्लेन ज़ोनिंग कानून के लिए एक मॉडल ड्राफ्ट बिल केंद्र सरकार द्वारा सभी राज्यों को भेजा गया था। कुछ राज्यों जैसे मणिपुर, राजस्थान ने भले ही इस पर कानून बनाया लेकिन इसे प्रभावी रूप से लागू नहीं किया। कई राज्यों ने इस पर कोई कानून बनाने से मना कर दिया तो कुछ राज्यों ने कानून बनाने को लेकर हामी तो भरी लेकिन अभी तक उस पर अमल नहीं किया।
क्या है उपाय? : लागू हो फ़्लड प्लेन एक्ट
प्रभावित फसलें ( कीमत)
2,93,000 करोड़ रु.
5000 करोड़ रु. सालाना औसत
प्रभावित फसलें ( क्षेत्रफल)
24 करोड़ हेक्टेयर
40 लाख हेक्टेयर सालाना औसत
प्रभावित आबादी
20 करोड़
30 लाख लोग सालाना औसत
प्रभावित क्षेत्र
44 करोड़ हेक्टेयर
70 लाख हेक्टेयर सालाना औसत
अगस्त 2018, केरल {48 घंटों में 31 सेंटीमीटर बारिश (483 मौतें)
जून 2013, उत्तराखंड {72 घंटों में 38.5 सेंटीमीटर बारिश (6000 मौतें)
नवंबर 2015 चेन्नई { 48 घंटों में 48.3 सेंटीमीटर बारिश (421 मौतें)
जुलाई 2005, मुंबई
{18 घंटों में 94 सेंटीमीटर बारिश (1493 मौतें)
जब बारिश ने मचाया कहर...
भारतीय मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 में देश के विभिन्न हिस्सों से भारी वर्षा और बाढ़ से संबंधित घटनाओं में 600 से अधिक लोगों की जानें गईं। इनमें असम से 129, केरल से 72, तेलंगाना से 61, बिहार से 54, महाराष्ट्र से 50, उत्तर प्रदेश से 48, हिमाचल प्रदेश से 38 मौतें शामिल थीं।
बाढ़/भारी बारिश से नुकसान (1953 से अब तक)
मानसून के दौरान शहरों-कस्बों में ऐसे दृश्य आम हो गए हैं। यह तस्वीर हाल ही में हुई बारिश के दौरान बिहार के गोपालगंज की है। आम दिनों में जहां वाहन चलते हैं, वहांं नावें चल रही हैं।
बढ़ रहा है बाढ़ का कहर
क्योंकि रोक न पा रहे अनियोजित विकास
मानसून के पैटर्न में बदलाव की वजह से होने वाली अत्यधिक बारिश से तो दिक्कतें हुई ही हैं, लेकिन इन दिक्कतों को बढ़ाने का काम किया है अनियोजित विकास कार्यों ने। बारिश से होने वाली आपदा को रोकने वाली प्राकृतिक सुरक्षा को हमने नष्ट कर दिया है। नदी एवं बड़े तालाबों के जलग्रहण क्षेत्रों में हमने सड़कें, इमारतें, कांक्रीट वर्क कर दिया है। ऐसे में बारिश का पानी, वह भी कुछ ही घंटों मंे मूसलाधार बारिश का पानी आखिर जाएगा कहां। प्राकृतिक जल निकासी के रास्ते बंद हो जाने से जल भराव होना शुरू होता है जो आपदा का रूप ले लेता हैं। बाढ़ से होने वाले जान-माल के नुकसान में वे शहर सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं जहां प्राकृतिक रक्षा प्रणाली को नजरंदाज किया गया है। इनमें मुंबई, चेन्नई, पुणे, हैदराबाद जैसे शहर और उत्तराखंड, कश्मीर राज्य शामिल हैं जहां सबसे ज्यादा नुकसान देखने को मिल रहा है।
बदल रहा है मानसून का पैटर्न क्योंकि बढ़ रही है ग्लोबल वॉर्मिंग
मानसून के स्वरूप या पैटर्न में आ रहे बदलावों को सीधे-सीधे जलवायु परिवर्तन एवं ग्लोबल वाॅर्मिंग से जोड़कर देखा जा रहा है। अब विशेषज्ञ इस बात पर एकमत हैं कि ग्लोबल वॉर्मिंग ने मौसम के मिजाज को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। आंकड़े भी इस बात की तस्दीक करते हैं। भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अनुसार वर्ष 1901 से 2018 के बीच में भारत में सतही हवा के तापमान में 0.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। सतही तापमान में बढ़ोतरी के परिणामस्वरूप वायुमंडलीय नमी में भी वृद्धि हुई है। वहीं 1951 से 2015 के दौरान हिंद महासागर में समुद्र की सतह के तापमान में भी लगभग 1 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि हुई है। इन विभिन्न फैक्टर्स में इस तरह से असामान्य बढ़ोतरी का असर सीधे-सीधे मानसून के पैटर्न पर पड़ा है और नतीजा अब सामने आ रहा है।
मा नसून आते ही मुंबई, दिल्ली और चेन्नई जैसे महानगर ही नहीं, बल्कि पटना, भागलपुर, वाराणसी, भोपाल जैसे शहरों के भी ‘पानी-पानी’ होने की खबरें सुर्खियां बनने लगती हैं। अब मानसून केवल बारिश ही नहीं ला रहा है, बल्कि महानगरों, शहरों से लेकर कस्बों तक में बाढ़ भी ला रहा है। इससे न केवल भारी वित्तीय क्षति पहुंच रही है, बल्कि हर साल ही कई लोगों को जान से हाथ भी धोना पड़ रहा है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार बाढ़ की वजह से देश को हर साल औसतन 5,649 करोड़ रुपए और 1,654 मानव जीवन का नुकसान हो रहा है। ऐसे में अगर हमने इन हालात को रोकने के पर्याप्त प्रबंध नहीं किए तो आने वाले सालों में बारिश से होने वाली आपदाएं भयंकर तबाही का सबब बन सकती हैं। आखिर देश में ऐसे हालात क्यों बन रहे हैं, इसका क्या असर हो रहा है और इसके लिए किया क्या जा सकता है।
‘भारी वर्षा दिवस’ बढ़ रहे हैं
क्योंकि बदल रहा है मानसून का पैटर्न...
आंकड़ों और विशेषज्ञों की मानें तो भारत में हर साल होने वाली मानसूनी बारिश की मात्रा में तो कोई खास फर्क नहीं आया है, लेकिन मानसून के पैटर्न में अच्छा-खासा फर्क आ गया है। भारत में होने वाली वार्षिक वर्षा में जून, जुलाई और सितंबर महीनों में मानसूनी बारिश का योगदान घट रहा है जबकि अगस्त की वर्षा का योगदान बढ़ रहा है। यानी जितनी बारिश पहले चार महीनों में होती थी, अब ज्यादातर बारिश एक माह में हो रही है। मौसम विभाग द्वारा वर्ष 1989-2018 के बीच वर्षा से जुड़े जिला स्तरीय आंकड़ों पर आधारित एक विश्लेषण में बताया गया है कि सौराष्ट्र, दक्षिणी राजस्थान, उत्तरी तमिलनाडु, उत्तरी आंध्रप्रदेश, दक्षिण-पश्चिमी ओडिशा, छत्तीसगढ़ के कुछ इलाके, दक्षिणी-पश्चिमी मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, मणिपुर, मिजोरम, कोंकण-गोवा एवं उत्तराखंड में ‘भारी वर्षा दिवस’ प्रभावित इलाकों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। भारी वर्षा दिवस का मतलब है एक दिन में 6.5 सेंटीमीटर से ज्यादा बारिश। इस कारण जहां मानसून के दौरान बारिश वाले दिनों में कमी आ रही है, वहीं भारी वर्षा वाले दिनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यही कारण है कि पिछले कुछ सालों में एकाएक मूसलाधार बारिश से भूस्खलन और अचानक आई बाढ़ से संबंधित आपदाओं का सिलसिला जोर पकड़ता जा रहा है। गंभीर चक्रवाती तूफानों की संख्या में भी कुछ सालों के दौरान काफी इजाफा हुआ है, जो चिंता की वजह है।
अब मानसून केवल बारिश ही नहीं ला रहा है, बल्कि साथ में भयंकर बाढ़ भी ला रहा है और बाढ़ के साथ आ रही है विनाशकारी तबाही।
अमृत माना जाने वाला वर्षाजल आखिर आफ़त बनकर क्यों टूट रहा है? इसी की पड़ताल करती इस बार की कवर स्टोरी ...
मकानों को पहुंची क्षति (लाख में)
5.5
बाढ़ में मरने वालों की संख्या (2016 से)
कवर स्टोरी
देबादित्यो सिन्हा
संस्थापक - विंध्य ईकोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री फाउंडेशन, वरिष्ठ शोधकर्ता- विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी
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