X

My Bookmarks

X

Select Date

Your Choices Regarding Cookies

We and third parties may deploy cookies and similar technologies when you use our site. Please review the information below and select the cookies for enhancing your Site/ App experience. However, you can change your consent choices at anytime by clicking “withdraw consent” from Hamburger menu/ left menu drawer on the Site/ App.

Web analytics

We use cookies to analyze and measure traffic to the site so that we know our audience and can improve our site, determine what stories are read, preferred news edition, default setting for the preferred news edition/ bookmarked news, where visitors come from, and how long they stay. Opt-In to these analytics cookies by clicking enable.

Content recommendation and personalization

We use third-party services for enabling your successful registration/subscription to E-paper module, to provide newsletters, content recommendations and customize your user experience and advertising. Opt-In to these content recommendation cookies by clicking enable. Please read our Cookie Policy and Privacy Policy for more details

Continue
Please Confirm

Are you sure you want to continue?

Download PDF

PDF Download option will be available after 12 PM only.

OK
Loading....
1234

आपकी ट्रायल अवधि के 18966 दिन शेष

कृपया अपना खाता सत्यापित करने के लिए अपनी वैध ईमेल आईडी दर्ज करें
X

समाधान के दो पहलूइस समस्या के समाधान में अभिभावक और शिक्षक दोनों की ही महत्वपूर्ण भूमिका है। इस समस समाधान के दो पहलूइस समस्या के समाधान में अभिभावक और शिक्षक दोनों की ही महत्वपूर्ण भूमिका है। इस समस्या के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से पता चलता है कि इसमें भावनात्मक और व्यावहारिक दोनों ही पहलू समान रूप से काम कर रहे हैं। इसलिए समाधान भी इन दोनों बातों को ध्यान में रखकर ही हो सकता है। अभिभावक ध्यान देंसबसे पहले अभिभावकों की भावनाओं और व्यवहार पर दृष्टि डालते हैं। जहां स्कूल भेजने को लेकर अभिभावकों के मन में चिंता का भाव रहना स्वाभाविक है, वहीं स्थिति सामान्य हाेने पर उन्हें यह भी ग़ौर करना चाहिए कि बच्चों का स्कूल जाना क्यों ज़रूरी है।अपने डर और चिंताओं की चर्चा बच्चों के सामने करने से बचें। सामान्य चिंता और अत्यधिक चिंता में भेद करना सीखें। सामान्य चिंता के रहते तो ज़रूरी एहतियात बरतते हुए बच्चों को स्कूल के लिए मानसिक रूप से तैयार कर पाएंगे। परंतु अत्याधिक चिंता करने से कहीं बच्चों को न डरा दें, इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा।बच्चों से स्कूल के विषय में सकारात्मक बातें करें। उन्हें स्कूल में क्या अच्छा लगता था यह याद दिलवाएं।स्कूल भेजने से कुछ हफ्ते पहले से ही उनकी दिनचर्या में परिवर्तन लाना शुरू कर दें। समय पर जगाएं, तैयार करके, नाश्ता करवाने के बाद, अलग से टेबल-कुर्सी लगाकर क्लास करने बिठाएं।क्लास के बीच, लेटने, खाने-पीने, टीवी देखने पर रोक लगाएं। बच्चों को घर पर रहना जितना सुखद और आरामदायक लगेगा, स्कूल जाने से उन्हें उतनी ही कठिनाई महसूस होगी।अगली बार बच्चों को स्कूल भेजने से पूर्व एक बार उनके दोस्तों और शिक्षकों से मिलवा लाएं, जिससे हिचक कम हो जाए।आप अपने मन में चाहे कितना भी घबरा रहें हों पर बच्चों के सामने आपको दृढ़ रहना होगा, तभी वे आत्मविश्वास के साथ स्कूल लौट पाएंगे। शिक्षक क्या करेंभविष्य में, जब स्कूल फिर पूरी क्षमता से खुलेंगे, तब शिक्षकों को भी अपने व्यवहार से सुनिश्चित करना होगा कि इतने विषम समय के बाद स्कूल आने पर बच्चों का मन अच्छा हो, वे ख़ुश रहें। पहले दिन से ही बच्चों पर पढ़ाई का ज़रूरत से ज़्यादा बोझ न डालें। उन्हें अपने सामान्य व्यवहार और अनुशासन में आने में समय लग सकता है। उनसे उनके मन की बात करें, उन्होंने इतना समय घर पर कैसे बिताया इसकी चर्चा करें। ध्यान रखें कि इस दुखद और कठिन समय में कई ने अपने अपनों को खोया है। उन्हें आपसे संवेदनशीलता की अपेक्षा है। पढ़ाई-लिखाई से पहले हमें उनका मन संभालना होगा। इसके लिए विभिन्न तरीक़े अपनाए जा सकते हैं।3 से 8 साल के बच्चों का उत्साहवर्धन करने के लिए, उनके मनोरंजन के साधन जुटाने होंगे। जैसे- झूले, खेल, खिलौने, चित्रकला, कहानियां इत्यादि जिससे उनका मन लगे और वे ख़ुुश होकर स्कूल आना शुरू कर दें।छोटे बच्चों को डांट-फटकार करने की जगह अत्यंत स्नेह से प्रेरित किया जा सकता है। ग़लतियों और शरारतों के लिए उन्हें तुरंत न डांटकर अलग से समझाना ज़्यादा उपयोगी माना गया है।बड़े बच्चों को लेक्चर द्वारा पढ़ाने की जगह आपस में चर्चा करके, विभिन्न मनोरंजक गतिविधियों द्वारा पढ़ाने से उनका मन जीता जा सकता है।उन्हें उनके जीवन के उद्देश्य और करियर के प्रति प्रेरित करने की भी आवश्यकता होती है। इससे उनमें स्वयं पढ़ाई के प्रति गंभीरता आती है।बच्चों के मन में स्कूल जाने को लेकर विभिन्न प्रकार के डर और चिंताएं हो सकती हैं। जैसे- मैं स्कूल जाऊंगा तो...‘मुझे घर की याद आएगी’,‘स्कूल में मुझसे कोई बात नहीं करेगा’,‘मेरा काम नहीं हुआ तो टीचर मुझे डांटेंगी’,‘मुझे कुछ नहीं आता’, ‘सब मेरी हंसी उड़ाएंगे’।बच्चों के मन की बातों को ध्यान से सुनें, शांति से समझाएं और आश्वस्त करें कि स्कूल जाना उनके लिए एक सुखद अनुभव होगा। ‘स्कूल नहीं जाना!’स्कूल खुले और बच्चों की आनाकानी शुरू हो गई। अभिभावक उन्हें समझाकर राज़ी कर पाते, उस ‘स्कूल नहीं जाना!’स्कूल खुले और बच्चों की आनाकानी शुरू हो गई। अभिभावक उन्हें समझाकर राज़ी कर पाते, उससे पहले अब फिर से स्कूल बंद होने लगे हैं। लेकिन कभी तो खुलेंगे ही!आपने देख लिया कि स्कूल उन्हें डरा रहा है। अत: इसके समाधान के लिए आपको अभी से प्रयास शुरू करने होंगे, ताकि एक बार फिर से स्कूल खुलें तो बच्चे आसानी से उस दिनचर्या को अपना लें। हुनर का ख़ज़ाना साथ है...विख्यात लेखक जैक कैनफील्ड ने कहा है, ‘कोई हमसे हमारा धन, हमारी सम्पत्ति, हमा हुनर का ख़ज़ाना साथ है...विख्यात लेखक जैक कैनफील्ड ने कहा है, ‘कोई हमसे हमारा धन, हमारी सम्पत्ति, हमारी सामाजिक स्थिति (जिस भी वरीयता को हमने हासिल किया हो), सबकुछ छीन सकता है, लेकिन इन सबको हासिल करने की प्रक्रिया में हम जो बन गए हैं, वो हमसे कोई नहीं छीन सकता।‘ जो बन गए हैं,’ से उनका आशय जो विशेषज्ञता, जो महारत हमने हासिल कर ली है, उससे है। यानी आप अपनी अर्जित वस्तुएं खो सकते हैं, जो कि समय के साथ खो भी जाती हैं, लेकिन अपने हुनर को नहीं खो सकते, जिसके बूते आपने वस्तुएं हासिल की थीं।जैक ने अपने एक दोस्त का उल्लेख किया है, जो एक लेखक हैं और जिन्होंने 1991 के ऑकलैड में हुए भीषण अग्निकांड में अपना घर गंवा दिया। उस घर में लेखक का सामान ही नहीं, पूरा पुस्तक संग्रह भी नष्ट हो गया, जिसमें हज़ारों की तादाद में किताबें थीं, साथ ही उनकी अपनी लिखी हुई किताबों की प्रतियों भी। ज़ाहिर है, यह एक बड़ा सदमा था, लेकिन उन लेखक ने जैक से कहा, ‘हां, मैं दुखी हूं। मेरा सारा संकलन राख हो गया, लेकिन मैंने महसूस किया है कि मेरे अंदर लेखक बनने के दौरान जो ख़ूबियां विकसित हुईं, जो कुछ मैंने सीखा, अपनी किताबों को लिखते हुए जो मैंने सीखा जो कुछ मैंने अपनी अब तक की ज़िंदगी में पढ़ा है, समझा है, आग उसे छू भी नहीं सकती है। जो खोया है, फिर से पाया जा सकता है। इस आग ने मेरी सोच को नया आयाम दिया है।’जब नदी मोड़ लेती है, तो उसका वेग और बढ़ता है। वही सूरत इंसान की ज़िंदगी में भी हो सकती है, यही लेखक का अभिप्राय है।यूं भी हम अपने जीवन में नए-नए लक्ष्य बनाकर, उन्हें हासिल करने की राह में रोज़ नया कुछ सीखते रहते हैं, वो समझ सदा हमारे साथ रहती है। पल्लवित होती रहती है, ऐसा कह सकते हैं। सीखने और सीखते रहने के क्षेत्रों की कोई कमी नहीं है और ना कमी होनी चाहिए हौसलों की।अगर डरना हो, तो सीखने की ललक और नए लक्ष्य बनाने की चाह और उन्हें हासिल करने के जुनून को खोने से डरें। ये साथ हैं, तो डर कैसा? हुनर का ख़ज़ाना तो बढ़ता ही जाएगा। व्हील चेयर रैम्पसीढ़ियों के साथ व्हील चेयर के रैम्प को इस तरह लगाया गया है कि वह जगह भी न घेरे और ज़रू व्हील चेयर रैम्पसीढ़ियों के साथ व्हील चेयर के रैम्प को इस तरह लगाया गया है कि वह जगह भी न घेरे और ज़रूरत होने पर आसानी से काम में लिया जा सके। ऐसे में व्हीलचेयर पर बैठने वाले व्यक्ति और सीढ़ी से उतरने वाले व्यक्ति को भी सहूलियत रहेगी।
X