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कोविड के बाद की दुनिया... कोविड के बाद की दुनिया... लोग क्या कहेंगे का भयक्या कहेंगे लोग, यह है सबसे बड़ा मानसिक रोग। मैं अक्सर कहता हूं कि लोग तो रंग बद लोग क्या कहेंगे का भयक्या कहेंगे लोग, यह है सबसे बड़ा मानसिक रोग। मैं अक्सर कहता हूं कि लोग तो रंग बदलते हैं। जब आप असफल होंगे तो वो कहेंगे कि हम तो जानते थे, क्योंकि आपमें दम वाली बात नहीं थी और पूरी मेहनत नहीं की। जब सफल हो जाएंगे तो वही लोग राय बदलकर कहेंगे कि हम तो पहले से जानते थे कि ये सफल ही होगा। लोग परिणाम के पीछे चलते हैं। लोगों को उत्तर देने का सबसे अच्छा तरीका है सफल होना।साथियो, इन तीन भय को आपको भी हराना है। हो सकता है कि ऊपर वाले ने आपको कोई बहुत बड़ी मंजिल हासिल करने के लिए भेजा है, हो सकता है कि आपके अंदर कोई ऐसी प्रतिभा हो जो आज तक बाहर नहीं आई है, हो सकता है कि आप कुछ ऐसा कर जाएं कि देश और समाज आपको याद करे और आपकी तरह बनना चाहे। यदि आप प्रयास ही नहीं करेंगे तो इनमें से कोई भी संभावना कभी सच नहीं हो पाएगी। अंतस ऊर्जा... अंतस ऊर्जा... दिमाग के घोड़े दौड़ाएंगे, तो सटीक समाधान भले न मिले पर नई राहें जरूर खुल जाएंगी।घोड़े काे उड़ना सिखाए दिमाग के घोड़े दौड़ाएंगे, तो सटीक समाधान भले न मिले पर नई राहें जरूर खुल जाएंगी।घोड़े काे उड़ना सिखाएं प्रेम करना अपने अहंकार को मिटाना है, यानी तुम उसे अपने ऊपर सत्ता सौंप रहे हो।प्रेम कोई सिद्धांत नहीं प्रेम करना अपने अहंकार को मिटाना है, यानी तुम उसे अपने ऊपर सत्ता सौंप रहे हो।प्रेम कोई सिद्धांत नहीं धूप बहुत कड़ी हो तो फिर बारिश आती हैलहर हमेशा ऊंची नहीं रहती, नदी भी सदा चढ़ी नहीं रहती।यह याद रखने की धूप बहुत कड़ी हो तो फिर बारिश आती हैलहर हमेशा ऊंची नहीं रहती, नदी भी सदा चढ़ी नहीं रहती।यह याद रखने की बात है कि धरती से अंकुर फूटने के लिए पानी की ज़रूरत होती है। हवाएं हमेशा हौले-हौले नहीं चल सकतीं, तूफानों की भी अपनी जगह है। इसी का ध्यान रखते हुए किसी ने कहा है कि अपनी ज़िंदगी के तूफानों का भी स्वागत करो।बस, कुछ ढाई माह पहले की ही तो बात है कि हम यकबयक हेलमेट उठाकर गाड़ी की चाबी लेकर निकल पड़ते थे, दिन हो या रात, कोई समस्या नहीं होती थी। कहीं से भी कोई वस्तु ख़रीदी, खा ली, जेब में या बैग में रख ली। घर से बाहर निकलते वक्त कुछ सोचना ही नहीं पड़ता था। न दोस्तों से दूरी, न कहीं घूमने जाने पर डर। कोविड-पूर्व ज़िंदगी में हमारे दैनिक क्रियाकलापों, गतिविधियों की सूची बनाएं, तो हैरान हो जाएंगे।चंद ही दिनों में सबकुछ बदल गया। एक शब्द ने, उससे जुड़े रोग के भय ने जीवन को पूरा बदल दिया। मास्क, दस्ताने, सैनेटाइज़र, यानी वो वस्तुएं अब अनिवार्यताओं में शामिल हैं, जिन्हें पहले किसी के घर में देख लेते थे, तो लगता था कि या तो घर में कोई गम्भीर रूप से बीमार है, या कोई सफ़ाई की सनक रखता है।दौरे जहां में एक ऊंची लहर उठी है। साहिल पर अफरा-तफरी मची है। लेकिन कोई लहर सदा के लिए उठान पर थोड़े ही रह सकती है। रात भी पूरी रात कहां रहती है। शाम के साथ घुलती आती है, तो सुबह से मिलते-मिलते विदा लेती है। सबसे बड़ी जगह रोशनी की होती है। वह अंधेरे पर पर्दा गिराते हुए आती है और तम के साए भले कितने भी गहरे हों, उनको एक किरण से बुहारने की क्षमता रखती है।वैसे भी अंधेरे का विस्तार नहीं होता। साम्राज्य उजालों के होते हैं। नज़र हो या नज़ारे, उजालों के अहसानमंद हैं। अंधेरे कहीं भी स्थायी नहीं हो सकते। कोविड के भी नहीं रहेेंगे। तूफान थमेगा, तो एक बार फिर शांत जल और सौम्य लहरें लौट आएंगी। यही बात आने वाले समय के लिए सच है।कोरोना से जूझते विश्व की झुलसन पर राहत का शीतल स्पर्श देने वाले समय का आना तय है। कभी-कभी ऐसा होता है कि अंधेरे के ख़त्म होने के इंतज़ार में उकताया, खीझा, निराश इंसान यह भूल जाता है कि उसने खिड़की तो खोली ही नहीं। हो सकता है, उजाले आने को ही हों।धूप कड़ी हो, उमस बड़ी हो, तो बारिश की आमद होती है। यह विज्ञान भी है और जीवन का सादा ज्ञान भी। खुशियों का इंतज़ार करते रहें हम, न निराश हों, न उम्मीद छोड़ें। मेज़बान के चेहरे पर मायूसी जंचती भी नहीं है। रविवार, 31 मई 2020 रविवार, 31 मई 2020
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