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सच जाना है माता-पिता नेदिल्ली से छुटि्टयों के लिए आए शुभांक ने देखा कि बहन के लिए घर में कई पाबंदिया सच जाना है माता-पिता नेदिल्ली से छुटि्टयों के लिए आए शुभांक ने देखा कि बहन के लिए घर में कई पाबंदियां हैं। उसे अपने ऑफिस में काम करने वाली लड़कियों में जो करियर को लेकर महत्वाकांक्षा दिखती रही है, वही छोटी बहन में भी है, लेकिन उसे हर समय घर के काम, मेहमाननवाज़ी के इंतज़ाम में भी खपता देख रहा था। उसने अपने माता-पिता से साफ़ तौर पर बात की कि उसे अपनी बहन को तरक़्क़ी करते देखना है। थोड़ी हैरानी और ना-नुकर के बाद वे मान गए। उन्होंने जाना कि बड़े होते बच्चे परिपक्व सोच के मालिक होते जा रहे हैं।इस रक्षाबंधन पर हो सकता है कि बहनें भाइयों के घर न जा पाएं, लेकिन मज़बूत बंधनों की मिसालें ज़रूर हर तरफ़ दिखाई देंगी। जो साथ हैं, उनके लिए तो यह त्योहार जुड़ाव की नींवों को पुष्ट करेगा। आमुख... रेवा जोशी आमुख... रेवा जोशी म हामारी के दौर ने हर रिश्ते पर गहरा असर डाला है- पति-पत्नी, परिवार के बड़ों के साथ रिश्ते, दफ़्तरी ना म हामारी के दौर ने हर रिश्ते पर गहरा असर डाला है- पति-पत्नी, परिवार के बड़ों के साथ रिश्ते, दफ़्तरी नातों, आस-पड़ोस, दोस्ती सभी रिश्ते प्रभावित हुए हैं। और गहराई से असर पड़ा है भाई-बहन के रिश्ते पर भी। उन पर भी जो दूर हैं और उन पर भी जो साथ हैं। सुखद यह है कि दोनों ही सूरतों में नज़दीकियां बढ़ी हैं।हो सकता है कि आप सोचें कि भाई-बहन तो पहले ही आपस में स्नेह के धागों से जुड़े हुए थे, तो इसमें नया क्या है? इन दो मिसालों से समझिए -सुगंधा को कूरियर वाले की मिन्नतें करते सुना, ‘भइया, इसे प्लीज़ वक़्त पर भेज दीजिएगा।’ दरअसल, पहले वो इस बात से परेशान थी कि महज़ दो-तीन ही दुकानों से राखी कैसे पसंद करे। उसे तो हर बार पूरा बाज़ार छान लेने के बाद ही कुछ पसंद आता था। लेकिन महामारी ने बाज़ार को सीमित किया था, सो उसने बड़ी मुश्किलों से बड़े भाई की राखी और भाभी का वंदन चुना। अब कूरियर पहुंच जाए इसकी दुआ कर रही थी। उसकी हड़बड़ाहट में यात्रा न कर पाने और भाई से दूर रहने की मजबूरी साफ़ झलक रही थी।वृंदा की छोटे वेदांत से न जमती हो, ऐसा नहीं था। लेकिन लॉकडाउन के दौरान चौबीस घंटे के साथ ने उन्हें हर रोज़ के झगड़ों में उलझाना शुरू कर दिया। शुरुआती दिनों में तो रोज़ की चिल्लपौं मचती, लेकिन धीरे-धीरे दोनों ने स्थितियों के साथ सांमजस्य बिठाना शुरू किया।पहले दोस्तों के बिना न रह सकने वाले भाई-बहन आज अक्सर साथ खेलते, बतियाते दिखते हैं।फर्क़ क्यों दिख रहा हैमुश्किल पूरी दुनिया पर आई है, सो चर्चा भी इसी की है, डर भी और एक-दूसरे की सेहत की दुआ भी। अब ज़्यादा बातें भी हो रही हैं, एक-दूजे को जानने की कोशिश भी और हिदायतों का बेहिसाब लेन-देन भी, वह भी बिना खीझे।जो भाई-बहन साथ रहते हैं, फिलहाल उनके पास एक-दूसरे के साथ रहने या ज़्यादा से ज़्यादा दोस्तों से वीडियो चैट करके बदलाव लाने की कोशिश के अलावा कोई चारा नहीं है। इसी मजबूरी से बढ़ने लगी हैं नज़दीकियां।क्या-क्या हो रहा है...आदर जागा हैतन्वी ने पहली बार जाना कि उसका भाई धम-धम करते हुए यानी पैर पटकते हुए चलता है। वो बहुत अच्छा जगलर है और ताश का महल बनाने में उसका कोई सानी नहीं। वहीं तनय ने जाना कि तन्वी पिछले एक साल से कोटेशंस की डायरी बना रही है। उसके पास उक्तियों का अद्‌भुत संकलन हो चुका है। उसकी हैंडराइटिंग देखकर तनय से सोच लिया है कि अपने प्रोजेक्ट को टाइप नहीं बल्कि हस्तलिखित सबमिट करेगा, तन्वी से लिखवाकर। अब दोनों एक-दूसरे की ख़ूबियों का आदर करने लगे हैं।मार्गदर्शक बने हैंविशाल जब आगे की पढ़ाई के लिए यूएस गया, तब नीता हाईस्कूल में पहुंच रही थी। हाल ही में विशाल वापस आया है, तो नीता उसके विदेश जाने वाली उम्र की हो चुकी है।शुरू में दोनों के बीच पहले झिझक रही, फिर तानों और चिढ़ का आदान-प्रदान हुआ और अब उन दोनों जैसा कोई दोस्त नहीं। नीता भी जल्द ही बाहर जाने की तैयारी में जुट चुकी है। उसे बड़े भाई के रूप में मार्गदर्शक जो मिला है। इंफो... डॉ. प्रशांत चौधरी नेत्र विशेषज्ञ, आकाश हेल्थकेयरनज़र है तो नज़ारे हैंहमारी कई सामान्य लगने इंफो... डॉ. प्रशांत चौधरी नेत्र विशेषज्ञ, आकाश हेल्थकेयरनज़र है तो नज़ारे हैंहमारी कई सामान्य लगने वाली आदतें, टालमटोली और लापरवाहियां आंखों को नुक़सान पहुंचा रही हैं। इन ग़लतियों पर एक नज़र डालिए...अधिक ठंड में बैठनाकुछ लोगों को तेज़ हवा या एसी में बैठने की आदत होती है। पर ये आंखों के लिए हानिकारक है। पंखे की तेज़ हवा और एयर कंडीशनर वातावरण की नमी को कम करते हैं, जो आंखों के सूखने का कारण बनता है।नियमित जांच न करवानाहम अमूमन आंखों की जांच तब तक नहीं कराते, जब तक कोई समस्या नहीं होती। आंखों की नियमित जांच कराते रहने से वे स्वस्थ रहती हैं। इससे आंखों की बीमारियों का समय पर पता चल जाता है जिससे वक़्त पर इलाज संभव हो जाता है। 16 साल से अधिक उम्र के हर व्यक्ति को हर दो साल में आंखों की जांच करवानी चाहिए। अगर पहले से आंखों की समस्या है तो इसमें लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। बच्चों की आंखों की जांच साल में एक बार ज़रूरी कराना चाहिए।कॉन्टेक्ट लेंस से जुड़ी ग़लतियांकॉन्टेक्ट लेंस आंखों में लगाए हुए सो जाना और लेंस लगाने से पहले हाथों को साबुन से न धोना नुक़सान पहुंचा सकता है। इससे आंखों में संक्रमण और स्थायी क्षति पहुंच सकती है।चश्मे के साथ लापरवाहीकुछ लोग चश्मे को रखने और इस्तेमाल करने में लापरवाही बरतते हैं। चश्मे का ध्यान रखना और साफ़ रखना बहुत ज़रूरी है। धूल भरे धुंधले चश्मे से दृष्टि प्रभावित हो सकती है जिससे सिरदर्द हो सकता है। यदि कांच टूट गया है तो इसे तुरंत बदलें। ऐसे चश्मे के इस्तेमाल से आंखों पर दबाव पड़ सकता है। हमेशा आंखों के लिए आरामदायक चश्मा पहनें। कम्प्यूटर स्क्रीन पर ज़्यादा समय बिताना पड़ता है तो यूवी प्रोटेक्शन वाले ग्लास पहन सकते हैं। इसके अलावा हमेशा अच्छी गुणवत्ता वाला चश्मा ही पहनें, सस्ते में न जाएं। सस्ते चश्मे भी आंखों को नुक़सान पहुंचाते हैं।आंखों को आराम न देनालगातार कम्प्यूटर पर काम करने के बाद मोबाइल और टीवी पर समय बिताना आंखों को हानि पहुंचा सकता है। आंखों को बीच-बीच में आराम दें। पांच से दस मिनट के लिए आंखें बंद कर लें। इसके अलावा 20-20-20 का नियम भी अपना सकते हैं। 20 मिनट अपनी स्क्रीन पर देखिए। फिर 20 सेकंड के लिए 20 फीट की दूरी पर स्थित किसी वस्तु को देखिए। इससे दृष्टि ठीक रहेगी, सिरदर्द और आंखों में सूखेपन की समस्या भी नहीं होगी। हाल ही के दौर में जिस रिश्ते ने मज़बूती के नए आयाम छुए हैं, वह है भाई-बहन का रिश्ता। राखी के अवसर पर हाल ही के दौर में जिस रिश्ते ने मज़बूती के नए आयाम छुए हैं, वह है भाई-बहन का रिश्ता। राखी के अवसर पर इस बंधन को क़रीब से देखना लाज़मी भी है।दूरियों ने और नज़दीक ला दिया है बेहतर ज़िंदगी... शब्बीर हुसैन, को-फाउंडर और क्रिएटिव हेड, हैट्स-ऑफ़ डिज़िटलमोबाइल फोन एक बड़े भाई की तर बेहतर ज़िंदगी... शब्बीर हुसैन, को-फाउंडर और क्रिएटिव हेड, हैट्स-ऑफ़ डिज़िटलमोबाइल फोन एक बड़े भाई की तरह सुरक्षा, मार्गदर्शन और जुड़ाव का एहसास देता है। 31 जुलाई को भारत में मोबाइल फोन सेवा के 25 बरस पूरे हो रहे हैं।शुक्रिया! मोबाइल भैया प हले के दौर में मोबाइल फोन नहीं थे। कुछ घरों में लैंडलाइन होते थे, जो कभी चलते थे और कभी बिल्कुल का प हले के दौर में मोबाइल फोन नहीं थे। कुछ घरों में लैंडलाइन होते थे, जो कभी चलते थे और कभी बिल्कुल काम देना बंद कर देते थे। लैंडलाइन से सिर्फ़ उन लोगों से ही बात की जा सकती थी जो घर में मौजूद हों। अगर व्यक्ति घर से बाहर हो, तो उससे जुड़ पाना मुश्किल होता था। ख़ासतौर पर घर की महिलाओं के लिए यह सबसे बड़ी समस्या थी। वे कहां हैं, कब घर लौटेंगे जैसी तमाम परेशानियों से हर रोज़ दो-चार होना पड़ता था। जब मोबाइल फोन आए, तो महिलाओं की ये परेशानी दूर हो गई। इनके अलावा भी कई उलझनें सुलझीं, जिससे उनकी ज़िंदगी आसान हो गई। जानकारी के स्रोत खुलेपहले महिलाओं का जीवन घर की चारदीवारी में ही गुज़र जाया करता था। घर के बाहर, देश और दुनिया में क्या चल रहा है, इसकी जानकारी के साधन सीमित थे। पर अब हर महिला के पास मोबाइल फोन है। सारी ख़बर मोबाइल से मिल जाती है। महिलाओं से संबंधित अधिकार और ज़रूरी जानकारियां उन तक पहुंच रही हैं, जिसने उन्हें जागरूक बनाने के साथ-साथ जानकार भी बनाया है। आत्मनिर्भर हो गईंरसोई या अन्य ज़रूरत के सामान के लिए महिलाएं परिवार में किसी न किसी सदस्य पर निर्भर हुआ करती थीं। पर अब स्मार्ट फोन के ज़रिए वे जो चाहे ले सकती हैं। घर का राशन, सिलेंडर, दवाइयां हों या ख़ुद की ज़रूरत का सामान, वे ख़ुद ऑनलाइन ख़रीद सकती हैं। इसके अलावा कहीं जाना हो, तो कैब बुक करना या जीपीएस की मदद से रास्ते खोजना भी आसान हो गया है। इसके लिए उन्हें किसी की मदद का इंतज़ार नहीं करना पड़ता। कई घरेलू महिलाएं अपना बैंक खाता भी स्वयं संभालना सीख गई हैं। सुरक्षा का सुकून हैपहले मोबाइल फोन जैसी सुविधा नहीं होती थी इसलिए ज़रूरत पड़ने पर बीच रास्ते में अपनों से बात करना या मदद लेना मुश्किल होता था। महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज़ से मोबाइल फोन मददगार साबित हुआ है। फोन में परिवार और दोस्तों के फोन नंबर के साथ-साथ सुरक्षा के एप्स और एसओएस भी है। मोबाइल की इस ख़ासियत से किसी भी राह पर और मुश्किल वक़्त पर मदद के लिए फोन कर सकती हैं। सीखकर आगे बढ़ींपहले और आज के समय में काफ़ी अंतर आ गया है। अब हर क्षेत्र में बदलाव और नए प्रयोग हो रहे हैं। वो पाककला हो या फैशन जगत, चित्रकारी हो या फोटोग्रैफी, ऑनलाइन व्यापार हो या निवेश, जिस क्षेत्र का चाहे उदाहरण ले लें, आज मोबाइल इंटरनेट के ज़रिए महिलाएं बिना घर से बाहर निकले बहुत कुछ सीख रहीं हैं और आत्मनिर्भर बन रही हैं। दुनिया को बेहतर जाना हैफोन पर ही उपलब्ध हैं दुनिया भर की सूचनाएं। इसका भंडार हाथ में लिए घूमती हैं स्त्रियां। उन्हें वित्त संबंधी मामलों के लिए भी किसी भी निर्भर रहने की ज़रूरत नहीं रह गई है। अपनों से दूर रहकर भी वे अब उनके पास ही हैं। किसी से अहसान लेने की ज़रूरत नहीं कि मां-पिता या भाई से बात करा दें। अपनों का बेहतर ख़्याल रखने की भी सुविधा मोबाइल ने दी है। ग़ौरतलब है कि...मोबाइल का इस्तेमाल करते वक़्त कई ऐसी ग़लतियां करते हैं जो इसे नुक़सान पहुंचा सकती हैं। ग़ौरतलब है कि...मोबाइल का इस्तेमाल करते वक़्त कई ऐसी ग़लतियां करते हैं जो इसे नुक़सान पहुंचा सकती हैं।फोन को री-स्टार्ट न करनामोबाइल का इस्तेमाल हम लगातार करते हैं। ये बना भी इसलिए है कि हम इसका लंबे समय तक इस्तेमाल कर सकें। पर मोबाइल को बेहतर तरीक़े से प्रयोग में लाने के लिए इसे री-स्टार्ट करना भी ज़रूरी है। हफ्ते में एक बार अपने मोबाइल को री-स्टार्ट ज़रूर करें ताकि वह भी कुछ समय के लिए शांत हो सके और बेहतर ढंग से काम कर सके। री-स्टार्ट करने के बाद आपका एंड्रॉइड फोन पहले से ज़्यादा सुगमता से काम करेगा।ग़ौरतलब... पेज 2 पर भी...
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