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हवाओं में फैलते ज़हर के रास्ते भी कई हैं और उसके बुरे असर भी। ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से अंटार्कटिका क हवाओं में फैलते ज़हर के रास्ते भी कई हैं और उसके बुरे असर भी। ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से अंटार्कटिका की बर्फ़ पिघलना, जंगलों की आग और शहरों के दम फूलने तक सब वायु प्रदूषण के असरात हैं।इन सबको ख़ुद ही ठीक होने का मौक़ा मिला पिछले दो महीनों में। इससे जुड़ी तस्वीरें हम सबने देखी हैं।कुछ हमने भी यहां प्रस्तुत की हैं ‘कायाकल्प’ के रूप में हर पेज पर। साथ ही कुछ ऐसे नवसृजनों का भी ज़िक्र है, जो हमारी आबोहवा को संवारने की तरफ़ एक अहम पहल हैं।प्रेरणा कहीं से भी मिल सकती है, और सराहना करना उस दिशा में पहला क़दम है। जो संवर चुकी है, उस क़ुदरत को संवरा रहने दें। कायाकल्प...बदल गई आबोहवाअभी दो महीने पहले तक पर्यावरण का जो हाल था, उसके बारे में आंकड़ों की सूरत हम कायाकल्प...बदल गई आबोहवाअभी दो महीने पहले तक पर्यावरण का जो हाल था, उसके बारे में आंकड़ों की सूरत हम हर दिन देखते-पढ़ते रहे हैं।उस सूरत को एक बार और देखिए- महज़ साठ दिन पहले तक हम लोग समुद्र में एक ट्रक बराबर कचरा हर मिनट डालते थे। आंकड़ों में 8 मिलियन मीट्रिक टन हर साल। 150 मिलियन मीट्रिक टन पहले से ही पानी में घूम रहा है। हमारी प्रकृति भी गौरैया जैसी ही प्रिय हो हमें, तो कितना अच्छा हो। हमारे पास की प्रकृति, हमारी देखी-भ हमारी प्रकृति भी गौरैया जैसी ही प्रिय हो हमें, तो कितना अच्छा हो। हमारे पास की प्रकृति, हमारी देखी-भाली है। इसको निहारने लायक़ बना सकते हैं, इसकी रक्षा कर सकते हैं, यह अहसास पिछले दो महीनों में दिलाया है ख़ुद प्रकृति ने। कितने साल हो गए थे कहते-कहते कि प्रकृति की रक्षा करनी है। बहुत दूर न जाओ, अपने घर के गिर्द ही पर्यावरण को संवार लो। वाहनों को, सड़कों को, हवा को, पानी को थोड़ा आराम करने दो। ख़ुद भी करो। लगातार खलबली मची रहे, तो मन भी बेचैन हो जाता है।लेकिन हम थे कि मथे जा रहे थे, नदियों को, सागरों को। हवाओं का भी सुकून छीन लिया। जाने कितने लोग, जो प्रकृति से प्यार करते हैं, कहते रहे कि पहाड़ों, नदियों पर इस तरह हावी मत होते जाओ कि इनका दम फूलने लगे। लेकिन हम इंसान कहां मानने वाले थे। हमें लगता था कि हमारी बुद्धि हमें सदा अपराजेय रखेगी। ‘पेड़-पौधे तो चल भी नहीं सकते, नदी-तालाब तटों में बंधे हैं, सागर बेवजह नहीं बहकेगा, आसमान भी कहां हर वक़्त रूठता है, चरिंदों-परिंदों को तो कब का जीत लिया, वन्य प्राणियों की हदें बांध दीं, पिंजरों में क़ैद कर लिया। हमें लगता था कि हमें मालूम है कि इन सबकी रासें कैसे थामी जाती हैं।और अचानक सारी हुकूमतें ख़त्म हो गईं। रास की डोरियां छूट गईं। अपराजेय होने का भ्रम टूटा। सर्वशक्तिमान प्रकृति का राज बना रहा। इंसान को बांधा और प्रकृति फिर संवर गई। जब हम बंधे, तो जाना कि बांधे जाने पर कैसा लगता है। यह भी समझ में आया कि जिसे जीतने का दावा किया करते थे, वो क़ुदरत तो सारे ज़ख़्मों से महज़ दो महीने में ही निजात पा गई। क़ैद सोचने का मौक़ा देती है। गर्द हटी, पहाड़ दिखने की ख़बरें आईं। पानी की कलकल लौटी। सागरों के तल साफ़ हुए। रातों की स्वाभाविक ठंडक लौट आई। तारे दिखने लगे। प्रकृति ने याद दिलाया कि ख़्याल हमें एक-दूसरे का रखना है। खिड़की पर फुदकती गौरैया अब भी साथ थी। पास की मुरलिया की तान ने क्लेश मिटाए।अब जब हम बाहर आएंगे, तो बहारों को बना रहने देंगे, यही उम्मीद है। कायाकल्प...इंडोनेशिया : जकार्ता की जान में जान आई कायाकल्प...इंडोनेशिया : जकार्ता की जान में जान आई ब्राह्मीयह पौधा भूमि पर फैलकर बड़ा होता है, यह आसानी से कैसी भी मिट्‌टी में लग जाता है।कैसे सेवन करें ब्राह्मीयह पौधा भूमि पर फैलकर बड़ा होता है, यह आसानी से कैसी भी मिट्‌टी में लग जाता है।कैसे सेवन करें Ã इसकी 4-5 पत्तियों को सुबह ख़ाली पेट चबाकर, पानी पिएं। रस निकालकर भी सेवन कर सकते हैं। यह शीतल होती है, सो सर्द मौसम में पत्तियों के सत को काली मिर्च के साथ लेना ठीक होगा।लाभ Ã ब्राह्मी मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करती है। बच्चों में एकाग्रता की कमी और बड़ी उम्र में भूलने की बीमारी में इसकी पत्तियों का सेवन करने से लाभ होता है।	गिलोयगिलोय बेल है, जो कटिंग से हर तरह की मिट्‌टी में लग जाती है।कैसे सेवन करें Ã गिलोय बेल की डालियां कूटकर पानी में उबालकर पी सकते हैं। जिन्हें मधुमेह न हो, वे इसमें थोड़ा शहद डालकर भी पी सकते हैं।लाभ Ã गिलोय में रोग प्रतिरोधक क्षमता दुरुस्त रखने वाली अहम औषधि है। बार-बार ज़ुकाम के पीड़ियों के लिए ख़ास फ़ायदेमंद है। श्वास के रोग, अर्थराइटिस, डेंगू या चिकनगुनिया, मधुमेह में ख़ास लाभ मिलता है।	कालमेघयह एक बहुवर्षीय पौधा है, जो आसानी से बीज या कटिंग से गमले या क्यारी में लग जाता है।कैसे सेवन करें Ã बुख़ार और खराश होने पर इसकी पत्तियों की चाय या जूस बनाकर पी सकते हैं। किंतु ध्यान रहे कि यह नीम से सौ गुना अधिक कड़वा होता है, इसलिए इसे ‘किंग ऑफ बिटर दस्तक... रचना समंदरबंधन का अर्थ समझा सबसे ख़ूबसूरत होती है नन्ही-सी गौरैया। कितनी छोटी, सादी-सी, भू दस्तक... रचना समंदरबंधन का अर्थ समझा सबसे ख़ूबसूरत होती है नन्ही-सी गौरैया। कितनी छोटी, सादी-सी, भूरे रंग की, लेकिन उसे देखकर शायद ही कोई नज़र फेर सके।  पंछी तो और भी बहुत हैं प्रकृति की गोद में। सुंदर पंखों वाले, चटकीले रंगों के, बेहद मधुर बोलने वाले, तो कुछ ऐसे चपल कि पलक झपकने से बाज़ी लगा सकें। ये इतनी आसानी से नहीं दिखते। दुर्लभ भी कई हैं। फिर भी गौरैया की बात अलग है। हम जानते हैं उसे। हमारे साथ, हमारी तरह रहती है। जानते हैं वो क्या खाती है, उसे किससे भय है, उसका घर भी देखा-भाला है हमारा। दूर के ढोलों से पास की मुरलिया बहुत मधुर है, बहुत अज़ीज़ होनी भी चाहिए। दैिनक ¼, शिनवार, 06/06/2020 दैिनक ¼, शिनवार, 06/06/2020
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