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}रोचक }तारिकाविश्व की देवियांभा रत में शक्ति उपासना का प्राचीन इतिहास है। शाक्त परम्परा में देवी को }रोचक }तारिकाविश्व की देवियांभा रत में शक्ति उपासना का प्राचीन इतिहास है। शाक्त परम्परा में देवी को परमब्रह्म माना गया है। किंतु सिर्फ़ भारतीय उपमहाद्वीप ही नहीं, संसार की प्रत्येक प्राचीन सभ्यता में देवी पूजन के साक्ष्य मिलते हैं। विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक हड़प्पा सभ्यता में भी मातृदेवी की असंख्य मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। ये मूर्तियां मातृदेवी या प्रकृति देवी की मानी जाती हैं। वहीं मिस्र की प्राचीन सभ्यता में कई तरह की देवियाें का उल्लेख मिलता है। यहां की मिथक कथाओं में सेखमेट नामक देवी का ज़िक्र मिलता है जो कि युद्ध की देवी भी मानी जाती हैं। उनका नाता रा (सूर्य) के साथ भी है और उन्हें एक सिंहनी या सिंहमुखी देवी के रूप में दर्शाया जाता है। आइसिस भी यहां की कथाओं में एक प्रमुख देवी मानी गई हैं। ग्रीक मिथक कथाओं में तो देवियों की पूरी सूची मौजूद है। हेबे यौवन की देवी, नेमेसिस दण्ड की देवी, लेटो मातृत्व की देवी, एफ्रोडाइट सौंदर्य, प्रेम की देवी, आर्टेमिस जंगली पशु, शिकार, वनस्पति, वन, पर्वत, शुद्धता और चंद्र देवी मानी जाती हैं। ग़ौरतलब है कि तुर्की के एफ़ेसस में आर्टेमिस को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है जिसका निर्माण छठी शताब्दी ईसापूर्व में हुआ था। इस मंदिर को विश्व के प्राचीन सात आश्चर्याें में गिना जाता है। वहीं जापान में अमेतरासु नामक देवी को प्रधान देवी माना जाता है और शिंतो मान्यता में उन्हें सूर्य देवी के रूप में देखा जाता है। मेसोपोटामिया में इश्तर नामक देवी का ज़िक्र मिलता है जिनका प्रेम, काम और युद्ध से नाता है। शक्ति-स्रोत शक्ति-स्रोत देवी दुर्गा के पौराणिक महत्व और आधुनिक संदर्भ की तुलनात्मक विवेचना एक विशद विषय है। देवी को केवल जड़ देवी दुर्गा के पौराणिक महत्व और आधुनिक संदर्भ की तुलनात्मक विवेचना एक विशद विषय है। देवी को केवल जड़ मान्यताओं और आस्था में बांधना सम्भव भी नहीं। ‘देवीमाहात्म्यम’ मार्कण्डेय पुराण का एक महत्वपूर्ण अंश है जिसमें 700 श्लोकों को सम्मिलित किया गया है, इसीलिए इसे ‘दुर्गा सप्तशती’ नाम भी दिया गया है। इस अंश में महिषासुर के वध के बहाने सृष्टि की प्रतीकात्मक व्याख्या की गई है। इस प्राचीन रचना का विशेष संदेश है कि विकास के शत्रु, अतिवादी और विध्वंसक शक्तियों को सुसंस्कृत और विवेकशील शक्ति ही परास्त कर सकती है। इस नई दृष्टि से देखें तो प्रकारांतर में देवी माहात्म्यम राष्ट्रीय एकजुटता का अाह्वान करने वाला पुराण-अंश है। नई दृष्टि से देखें तो भारतीय राष्ट्र की शक्ति अजेय है जिसका भेदन दुष्कर इसलिए है क्योंकि यह देवी दुर्गा द्वारा संरक्षित है।शाक्त सम्प्रदाय में मां दुर्गा को समस्त संसार की पराशक्ति और सर्वशक्ति-सम्पन्न देवी की सर्वोच्चता प्राप्त है। वेदों में उनके माहात्म्य का व्यापक उल्लेख मिलता है। उपनिषदों में वे हमें ‘उमा हैमवती’ के रूप में मिलती हैं। पुराणों में भी उनका उल्लेख आदिशक्ति के रूप में है और उन्हें शिव की अर्द्धांगिनी माना गया है। साथ ही साथ उन्हें प्रकृति की परम स्वामिनी, बुद्धि और वैभव की जननी तथा समस्त विकारों से मुक्त भी बताया गया है। सम्भवतः इसीलिए उन्हें वैभवी और योगमाया भी कहा गया है। उनके बारे में सामान्य मान्यता है कि वे धर्म पर आघात करने वाली आसुरी प्रवृत्तियों का विनाश करने और शांति-समृद्धि की स्थापना के लिए अवतरित हुई हैं। भागवत पुराण में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि देवी दुर्गा का अवतरण श्रेष्ठ मनुष्यों की रक्षा करने के लिए हुआ था। शक्ति रूपेण संस्थिता! शक्ति रूपेण संस्थिता! आमुख}प्रभात कुमार आमुख}प्रभात कुमार मां दुर्गा के नामों में एककन्या, कैशोरी, युवती, प्रौढ़ा, वृद्धमाता भी हैं। हर स्त्री में दुर्गा है, मां दुर्गा के नामों में एककन्या, कैशोरी, युवती, प्रौढ़ा, वृद्धमाता भी हैं। हर स्त्री में दुर्गा है, इसलिए एक आम स्त्री भी देवी की तरह विविध रूप धरकर अनेकानेक भूमिकाएं निभाती है। दुर्गा प्राणियों की शक्ति हैं और परिवर्तन की प्रेरक भी। शारदीय नवरात्र उनकी उपासना से स्वयं को शुद्ध करके बदलने का अवसर है। भ गवती दुर्गा के 108 नामों में आद्या (मूल, आरंभ) है, तो चिता (मृत्युशय्या) भी। लोकमानस में देवी के क भ गवती दुर्गा के 108 नामों में आद्या (मूल, आरंभ) है, तो चिता (मृत्युशय्या) भी। लोकमानस में देवी के कई रूप हैं। कुछ स्नेहशील और ममतामय हैं, तो कुछ हिंसक और डरावने भी। उनका सर्वाधिक शांत, सुंदर और कांतिमय रूप ‘गौरी’ है और सबसे उग्र, हिंसक और क्रूर रूप देवी ‘काली’ का है।अपने इन्हीं विविध रूपों और नामों के साथ मां दुर्गा पूजी जाती हैं। इसकी दो तरह से व्याख्या की जा सकती है-हर स्त्री है दुर्गा ...देवी की आठ भुजाओं और उनमें सुशोभित अस्त्र-शस्त्रों की तुलना आज अथवा पहले की स्त्री से करें। हम देखेंगे कि हमारे समाज में स्त्रियों पर बहुआयामी कर्तव्य और उत्तरदायित्व का बोझ रहा है और उन्होंने पूरी सफलता, सामर्थ्य और निष्ठा के साथ उनका निर्वहन भी किया है। स्पष्ट है कि स्त्री-अस्मिता के सर्वोत्तम प्रतीक के रूप में देवी आराधना धार्मिक दृष्टि से ही नहीं अपितु सामाजिक दृष्टि से भी तर्कसंगत होगी।परिवर्तन की प्रेरक ...देवदत्त पटनायक कहते हैं कि देवी जब अपना रूप बदलती हैं, तो वे परिवर्तन के लिए प्रेरित करती हैं। सर्जक भंजक में परिवर्तित हो सकता है। भंजक रक्षक में बदल सकता है। जो हानि पहुंचाता है वह संरक्षण कर सकता है। जो इच्छा करता है वह संयम भी दिखा सकता है। देवी हमारे इर्द-गिर्द की दुनिया हैं। देवी हमें प्रेरित करती हैं। वे हमारे भीतर इच्छा पैदा करती हैं।नवदुर्गा का नवाचार ...नवदुर्गा के नौ रूपों में शैलपुत्री को स्वाभिमानी और दृढ़ इच्छाशक्ति संपन्न, ब्रह्मचारिणी को स्थिरमना और संघर्षशील और चंद्रघंटा को कल्याणकारिणी माना जाता है। इसी तरह कूष्मांडा गर्भ धारण करने वाली, स्कंदमाता और कात्यायनी-स्वरूप संततियों के माता-पिता और पालनहार, कालरात्रि जड़ जीवन से मुक्त होकर एक चेतना सम्पन्न मोक्ष की प्राप्ति आदि की द्योतक है। भगवती का आठवां रूप महागौरी और नौवां रूप सिद्धिदात्री अर्थात ज्ञान अथवा बोध देने वाली देवी का है। ये देवी दुर्गा के सबसे दुर्लभ रूप हैं जिनके साक्षात्कार के लिए परम सिद्ध होने की आवश्यकता है। सूक्ष्मता से देखें तो एक आम भारतीय नारी में भी ये दुर्लभ रूप उपस्थित हैं, किंतु उनका सम्पूर्णता के साथ दर्शन से करने के लिए अपेक्षित धैर्य की आवश्यकता है।परिवर्तन का अवसर ...नवरात्र एक ऐसा पर्व है जो साल में तीन बार मनाया जाता है। इसमें चैत्र नवरात्र, शारदीय नवरात्र और गुप्त नवरात्र शामिल हैं। उत्सवधर्मिता और धार्मिक महत्ता की दृष्टि से शारदीय नवरात्र को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। बहरहाल, इस वर्ष वैश्विक महामारी के मद्देनज़र ज़ाहिर है कि सारी दुनिया पर असर पड़ा है। त्योहार और सामाजिक-धार्मिक जीवन पर भी इसके तात्कालिक प्रभाव पड़े हैं। ऐसे में हमारे आस्था सम्बंधी विधानों और सामाजिक आचरण में थोड़ा-बहुत अंतर भी आएगा। देवी दुर्गा इस संकट की घड़ी में हमें अपने विकारों और विचारों दोनों को शुद्ध करने का अवसर और शक्ति देंगी, इसका दृढ़ विश्वास है। अत: ये नौ दिन संकट मिटने और जीवन में सुख, समृद्धि और सुरक्षा अाने का माध्यम बन सकते हैं। }इन्फो }नौ दिननौ प्रसाद }इन्फो }नौ दिननौ प्रसाद नवरात्र के नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है।मां के हर स्वरूप के लिए इन ख़ास नवरात्र के नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है।मां के हर स्वरूप के लिए इन ख़ास चीज़ों को प्रसाद के तौर पर चढ़ाएं।घी का प्रसादनवरात्र के पहले दिन देवी शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इस दिन मां को गाय के घी का भोग लगाना चाहिए। माना जाता है कि इससे आरोग्य लाभ की प्राप्ति होती है।शक्कर का भोगदूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी को पूजा जाता है। मातारानी को शक्कर या मिश्री का भोग लगाया जाता है।दूध अर्पित करेंतीसरे दिन मां के तृतीय स्वरूप चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। माता को दूध के बने पकवानों का भोग पंसद है। प्रसाद में दूध या उससे बनी चीज़ें अर्पित करें।मां के लिए मालपुआचौथे दिन मां कूष्मांडा की आराधना की जाती है। मां को प्रसन्न करने के लिए उन्हें मालपुए का भोग लगाएं।केले का भोगनवरात्र के पांचवें दिन स्कंदमाता की पूजा होती है। इस दिन को पंचमी भी कहा जाता है। मां स्कंदमाता को केले का भोग लगाएं।मीठा शहदनवरात्र के छठे दिन देवी कात्यायनी का पूजन होता है। माता का आशीर्वाद पाने के लिए इस दिन माता उनके लिए शहद का प्रसाद बनाएं।मां के लिए गुड़सातवें दिन देवी कालरात्रि की पूजा की जाती है। इस दिन मां को गुड़ या गुड़ से निर्मित चीज़ों का भोग अर्पित करना चाहिए।भोग में नारियलआठवां दिन महागौरी का होता है। महागौरी को नारियल का भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि इससे सुख-समृद्धि की प्राप्त होती है।प्रदास में तिलनवरात्र के आखिरी दिन देवी सिद्धिदात्री की पूजा होती है। इस दिन देवी को तिल का भोग लगाया जाता है। माना जाता है कि इससे परिवार को सुख-शांति मिलती है। }ग़ौरतलब है कि...हर कुल में एक भक्तवत्सला कुलदेवी शक्ति का परम स्रोत होती हैं। इस बार देश की ऐसी ही }ग़ौरतलब है कि...हर कुल में एक भक्तवत्सला कुलदेवी शक्ति का परम स्रोत होती हैं। इस बार देश की ऐसी ही कुछ कुलदेवियों के चरणवंदन का सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ है।करणी माताबीकानेर के राठौड़ वंश की कुलदेवी करणी माता हैं। मान्यता है कि देवी दुर्गा ने 14वीं शताब्दी में जोधपुर के एक गांव में रिद्धिबाई नाम से जन्म लिया था, जो आगे चलकर करणी माता के नाम से लोकप्रसिद्ध हुईं। बीकानेर के देशनोक में करणी माता का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। यह स्थान यहां अत्यधिक संख्या में पाए जाने वाले चूहों के लिए भी प्रसिद्ध है। नवरात्र के अवसर पर यहां एक बड़े मेले का आयोजन भी किया जाता है। कहते हैं कि इस मंदिर में यदि किसी को सफ़ेद चूहा दिखाई देता है तो वह सौभाग्यशाली होता है। यहां सफ़ेद चूहों को काबा कहते हैं। 17 अक्टूबर नवरात्र आरंभ 17 अक्टूबर नवरात्र आरंभ
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